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जिसके पुरखे भटकाने की - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२


ये मत समझो मान के अपना गले लगाने आया है
जीवन में  खुशियाँ  कैसे  हैं  भेद  चुराने  आया है।१।

**
अनहोनी सी लगती मुझको अब कुछ होने वाली है
नदिया के तट आज समन्दर प्यास बुझाने आया है।२।

**
जिसके पुरखे भटकाने की रोटी खाया करते थे
वो कहता है आज देश को राह दिखाने आया है।३।

**
जिस बस्ती को दसकों पहले हमने खूब सदाएँ दी
उस बस्ती को सूरज  देखो  आज जगाने आया है।४।

**
अपने हिस्से तूफाँ तो थे माझी भी क्या खूब मिला
पतवारों  को  तोड़-ताड़कर  यार  बचाने  आया है।५।

**
कर्ज उधारी उपहारों की रीत धनिक के हिस्से में
कौन भला ऐसे निर्धन  के  ठौर ठिकाने आया है।६।

**

मौलिक.अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' 23 hours ago

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और मार्गदर्शन के लिए आभार।

Comment by Samar kabeer yesterday

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

'जिस बस्ती को दसकों पहले हमने खूब सदाएँ दी'

इस मिसरे में 'दसकों' को ''दशकों" और 'दी' को "दीं" कर लें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Friday

आ. भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन । गजल पर मनोहारी प्रतिक्रिया के लिए आभार। ओबीओ परिवार के गुणी जनों के परामर्श से लेखन को सुधारने का प्रयास कर रहा हूँ । आपका स्नेहाशीष बना रहे यही आकाक्षा है । सादर...

Comment by vijay nikore on Thursday

आप गज़ल अच्छी लिखते हैं। हार्दिक बधाई, मित्र लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Wednesday

आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on January 15, 2020 at 10:29am

आदरणीय मुसाफ़िर भाई, सादर अभिवादन। इस सुंदर रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 14, 2020 at 3:54pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन। आपको गजल अच्छी लगी, लेखन सपल हुआ। स्नेह एवं उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by TEJ VEER SINGH on January 14, 2020 at 12:48pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। लाज़वाब गज़ल।

जिसके पुरखे भटकाने की रोटी खाया करते थे
वो कहता है आज देश को राह दिखाने आया है।३।

**
जिस बस्ती को दसकों पहले हमने खूब सदाएँ दी
उस बस्ती को सूरज  देखो  आज जगाने आया है।४।

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