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झूठ का व्यापार - ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

झूठ का व्यापार बढ़ता जा रहा है आजकल,
और हर इक पर नशा ये छा रहा है आजकल

है लड़ाई का नजारा हर तरफ देखें जिधर,
आदमी ही आदमी को खा रहा है आजकल

इस प्रगति के नाम पर ही मिट रहे संस्कार सब
झूठ को हर आदमी अपना रहा है आजकल

बाँटकर भगवान को नेता खुशी से झूमकर
काबा’ तेरा काशी’ मेरी गा रहा है आजकल

जाग ‘मेठानी’ बचायें आग से अपना चमन
नित नया जालिम जलाने आ रहा है आजकल

( मौलिक एवं अप्रकाशित )
- दयाराम मेठानी

Views: 726

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 13, 2019 at 6:18pm

वाह आदरणीय बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है..

Comment by Dayaram Methani on April 9, 2019 at 11:08pm

 बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय अनामिका घातक जी।

Comment by Dayaram Methani on April 9, 2019 at 11:07pm

प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय तेजवीर सिंह जी।

Comment by Dayaram Methani on April 9, 2019 at 11:05pm

प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार आदरणीय समर कबीर जी।

Comment by Samar kabeer on April 9, 2019 at 5:58pm

जनाब दयाराम मेठानी जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 8, 2019 at 6:26pm

हार्दिक बधाई आदरणीय दयाराम जी।बेहतरीन गज़ल।

बाँटकर भगवान को नेता खुशी से झूमकर
काबा’ तेरा काशी’ मेरी गा रहा है आजकल

Comment by anamika ghatak on April 8, 2019 at 5:40pm

अत्यंत सुंदर लिखा है। सच्चाई बयाँ किया है आपने

कृपया ध्यान दे...

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