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काँच पत्थर से भले टकरा गया। (ग़ज़ल- बलराम धाकड़)

2122 2122 212

काँच पत्थर से भले टकरा गया।
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा समझा गया।

फ़िर सियासत में हुई हलचल कहीं,
मीडिया के हाथ मुद्दा आ गया।

सारी दुनिया एक कुनबा है अगर,
आयतन रिश्तों का क्यों घटता गया?

इक बतोलेबाज की डींगें सुनीं,
आदमी घुटनों के ऊपर आ गया।

फिर किसी औरत का दामन जल गया,
फ़िर किसी का कोई बचपन खा गया।

ज़लज़ले के बाद की तस्वीर में,
देखकर फ़ानी जहां घबरा गया।

वासिते उसके मेरे दिल में दबीं,
लाख गिरहें थीं मगर सुलझा गया।

शुक्रिया! ऐ ज़िंदगानी के चलन,
शायरी के मायने समझा गया।

क्यों किराए की इमारत पर गुमां?
मौत आई, रूह का क़ब्ज़ा गया।

नौकरी पूरी हुई, कुर्सी गई,
शुहरतें रुख़सत हुईं, रुतबा गया।

~मौलिक/अप्रकाशित।

~ बलराम धाकड़ ।

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 3, 2018 at 12:38pm

आ. भाई बलराम जी, सादर अभिवादन । सुंदर गजल हुयी है हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on November 3, 2018 at 12:07pm

हार्दिक बधाई आदरणीय बलराम जी। बेहतरीन गज़ल।

क्यों किराए की इमारत पर गुमां?
मौत आई, रूह का क़ब्ज़ा गया।

Comment by Samar kabeer on November 3, 2018 at 11:56am

जनाब बलराम धाकड़ जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

5वें शैर में तक़ाबुल-इ-रदीफ़ के बारे में जनाब निलेश जी बता चुके हैं ।

'शायरी के मायने समझा गया'

इस मिस्ररे में "मायने" कोई शब्द ही नहीं है,देखियेगा ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on November 3, 2018 at 8:49am

आदरणीय बलराम धाकड़ जी सादर नमस्कार, शुभ प्रभातम, बहुत सुंदर गजल , आनंद आ गया , बधाई आपको 

Comment by राज़ नवादवी on November 3, 2018 at 6:00am

आदरणीय बलराम धाकड़ जी, आदाब. सुन्दर गजल की प्रस्तुति पे दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ. 

क्यों किराए की इमारत पर गुमां?
मौत आई, रूह का क़ब्ज़ा गया।

बहुत खूब. सादर. 

Comment by Balram Dhakar on November 2, 2018 at 8:49pm

आदरणीय गुरप्रीत सिंह जी, आपको ग़ज़ल अच्छी लगी, मैं अनुग्रहीत हुआ।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on November 2, 2018 at 8:48pm

आपका बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय नीलेश जी, ग़ज़ल में शिरक़त और हौसला अफजाई का।

आपके सुझाव अनुसार शायद तक़ाबुल ए रदीफ़ हो रहा है, बदलाव का प्रयास करता हूँ।

वैसे आपकी हौसला अफजाई और सुझाव के तरीके के लिए आपको भी बहुत बहुत बधाई।

सादर।

Comment by Gurpreet Singh jammu on November 2, 2018 at 8:23pm

वाह वाह आदरणीय बलराम धाकड़ जी , क्या शानदार  ग़ज़ल कही है आपने,  आनंद आ गया पढ़कर । बधाई स्वीकार करें 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 2, 2018 at 6:39pm

आज फिर बलराम धाकड़ छा गया 
उस का ये अंदाज़ सब को भा गया ...
.
पाँचवा जो शेर है उस में मियाँ
ऐब छोटा सा रादीफ़ी आ गया ..
बधाई  
 

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