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ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से)

1212,1122,1212,22/112

तमाम ख़्वाब जलाने से, दिल जलाने से।
चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से।

हमें अदा न करो हक़, हिसाब ही दे दो,
नदी खड़ी हुई है दूर क्यों मुहाने से।

चराग़ ही के तले क्यों अंधेरा होता है,
ये राज़ खुल न सकेगा कभी ज़माने से।

वो सूखती हुई बेलों को सींचकर देखें,
ख़ुदा मिला है किसे घंटियाँ बजाने से।

शमां जलेगी, अंधेरे पनाह मांगेंगे,
हुई है रात उमीदों की लौ बुझाने से।

ये रोज़-रोज़ के फ़ाके हमें नहीं मंज़ूर,
चलो कि दूर चलें ऐसे आशियाने से।

तुम्हारी याद यहाँ चैन से न जीने दे,
ख़ुदा निज़ात ही दे दे अब इस फ़साने से।

~ बलराम धाकड़ ।

(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment by Balram Dhakar yesterday

बहुत शुक्रिया, आदरणीय विनय कुमार जी, सुख़न नवाज़ी का।

सादर।

Comment by विनय कुमार on December 27, 2018 at 6:12pm

वाह, बहुत बढ़िया और प्रभावशाली ग़ज़ल कही है आपने आ बलराम जाखड़ जी, बधाईया क़ुबूल कीजिये

Comment by Balram Dhakar on December 20, 2018 at 9:38am

आदरणीय सुरेंद्र जी, ग़ज़ल आपको पसंद आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ।

सादर।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on December 20, 2018 at 9:29am

आद0 बलराम धाकड़ जी सादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल कही आपने। दिल से मुबारकबाद पेश करता हूँ

Comment by Balram Dhakar on December 18, 2018 at 9:10am

आदरणीय समर सर, सादर अभिवादन। ग़ज़ल में आपकी शिरक़त की प्रतीक्षा समाप्त हुई और हर बार की तरह बहुत कुछ सीखने को भी मिला।

हौसला अफजाई का भी बहुत बहुत शुक्रिया।

आपके सुझावों के मुताबिक़ सुधार कर लूँगा।

सादर।

Comment by Samar kabeer on December 17, 2018 at 2:26pm

जनाब बलराम धाकड़ जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

तमाम ख़्वाब जलाने से, दिल जलाने से।
चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से'

इस शैर के ऊला मिसरे में 'जलाने से', शब्द दो बार खटक रहा है,ऊला मिसरा यूँ कर सकते हैं:-

'तमाम ख़्वाब जले अपना दिल जलाने से'

' हमें अदा न करो हक़, हिसाब ही दे दो,
नदी खड़ी हुई है दूर क्यों मुहाने से'

इस शैर को यूँ कर लें तो गेयता बढ़ जाएगी:-

'हमारा हक़ न अदा कर हिसाब तो दे दे

खड़ी हुई है नदी दूर क्यों मुहाने से'

' ये राज़ खुल न सकेगा कभी ज़माने से'

इस मिसरे में रदीफ़ 'से' की जगह 'पे' हो रही है,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'ये अक़्द: हल नहीं होगा कभी ज़माने से'

' शमां जलेगी, अंधेरे पनाह मांगेंगे'

ये मिसरा बह्र में नहीं,क्योंकि सहीह शब्द है "शम'अ"21,आपने इस शब्द को 12 लिया है,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'जलेगी शम'अ अँधेरे पनाह माँगेंगे'

बाक़ी शुभ शुभ ।

Comment by Balram Dhakar on December 15, 2018 at 9:50am

आदरणीय नरेंद्र जी, बहुत बहुत धन्यवाद।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on December 15, 2018 at 9:50am

जनाब राज़ साहब, सुख़न नवाज़ीका बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Balram Dhakar on December 15, 2018 at 9:49am

ग़ज़ल में शिरक़त और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय लक्ष्मण जी।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on December 15, 2018 at 9:48am

बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय चंद्रशेखर जी।

सादर।

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