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गजल २१२२ २१२२ 
बात जो मन में तही है
कुछ कही कुछ अनकही है
भार ढोती है जगत का
तब धरा यह पुज रही है
याद वो, आये न आये
पर सताती रोज ही है
है कठिन यह जान पाना
क्या गलत है क्या सही है
इस कदर छाया है दिल पर
हर जगह दिखता वही है
सच कहो अब चुप न बैठो
क्यों जमा मुँह में दही है
राम के दरबार में सब
आपकी खाता बही है
"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 7, 2018 at 3:34pm

आदरणीया babitagupta जी आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by babitagupta on July 16, 2018 at 8:53pm

बेहतरीन गजल प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय बसंत सरजी।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 14, 2018 at 8:41pm

आदरणीय विजय निकोरे जी दिल से शुक्रिया आपका , सह कहा आपने इस मंच पर आदरणीय समर कबीर जी का नेह बरसता ही है 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 14, 2018 at 8:40pm

आदरणीय अजय तिवारी जी दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 14, 2018 at 8:39pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 14, 2018 at 8:39pm

आदरणीया नीलम उपाध्याय जी दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by Samar kabeer on July 14, 2018 at 6:00pm

भाई विजय निकोर जी,आपकी महब्बत सर आँखों पर ।

Comment by vijay nikore on July 14, 2018 at 2:57pm

भाई समर जी, आप हमेशा इतनी अच्छी सहीह जानकारी देते हैँ कि पढ़ते ही और जानने को मन करता है। ...और मन यह भी करता है कि आपको बस सुनता रहूँ।

Comment by vijay nikore on July 14, 2018 at 2:54pm

अच्छी गज़ल के लिए बधाई

Comment by Ajay Tiwari on July 14, 2018 at 6:13am

आदरणीय बसंत जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई. 

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