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गजल(ओ प न बु क् स औ न ला इ न)

2122    2122  212
ओस की बूंदें भी' प्यासी हैं अभी
परकटी चाहें अधूरी हैं अभी।1

नश्तरों का हाल अब मत पूछना
बुत बनी रातें यूँ तारी हैं अभी।2

क्या करोगे जानकर सब सिलसिला?
सच मरा है, बातें' टेढ़ी हैं अभी।3

औरतों के नाम लेके आजकल
नख चले,घातें यूँ' माती हैं अभी।4

लाइलाजों का करो कुछ तो जतन
इल्म वाली बाँहें' बाकी हैं अभी।5

नर्म बिस्तर के सिवा झपकी नहीं?
नाखुदाओ! लपटें' खासी हैं अभी।6
"मौलिक व अप्र का शि त"

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Comment by amod shrivastav (bindouri) on April 26, 2019 at 12:41pm

आ मनन साहब जी प्रणाम
गजल का हर शे "र लाजवाब है दिली बधाई नमन

Comment by Manan Kumar singh on May 5, 2018 at 10:42am

आपका आभार आदरणीय ब्रिज जी।

Comment by Manan Kumar singh on May 5, 2018 at 10:42am

शुक्रिया आदरणीय समर जी।

Comment by Manan Kumar singh on May 5, 2018 at 10:41am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय तेजवीर जी।

Comment by Manan Kumar singh on May 5, 2018 at 10:40am

आपका आभार आदरणीय आरिफ जी।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 27, 2018 at 3:54pm

अच्छी ग़ज़ल हुई आदरणीय...

Comment by Samar kabeer on April 24, 2018 at 11:32am

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 23, 2018 at 2:09pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार जी।बेहतरीन गज़ल।

क्या करोगे जानकर सब सिलसिला?
सच मरा है, बातें' टेढ़ी हैं अभी।3

Comment by Mohammed Arif on April 23, 2018 at 1:43pm

आदरणीय मनन कुमार जी आदाब,

                          एक अच्छी ग़ज़ल के लिए शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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