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"तरही ग़ज़ल , जनाब रवि शुक्ल साहिब की नज़्र"

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फाइलुन

पहले अपनी रूह का ये मक़बरा रोशन करें
और इसके बाद हम सोचें कि क्या रोशन करें

गर मयस्सर घी नहीं है,तेल का रोशन करें
मन्दिर-ओ-मस्जिद में जाएँ इक दिया रोशन करें

ये हमारी ज़िम्मेदारी है, हमारा फ़र्ज़ भी
नाम अपने बाप दादा का सदा रोशन करें

नफरतों के इन अँधेरों को मिटाने के लिये
हम चराग़ उल्फ़त के यारो जा ब जा रोशन करें

याद कर के नज़्म 'हाली'की,ज़ईफ़ा की तरह
झुटपुटे के वक़्त मिट्टी का दिया रोशन करें

आम कर दीजे 'ज़फ़र' साहिब के इस पैग़ाम को
"इक दिया जब साथ छोड़े, दूसरा रोशन करें

--समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 11, 2017 at 3:24pm
वल्लाह ! बहुत ख़ूब जनाब समर साहब। हार्दिक बधाई ।
Comment by narendrasinh chauhan on May 11, 2017 at 3:09pm

पहले अपनी रूह का ये मक़बरा रोशन करें
और इसके बाद हम सोचें कि क्या रोशन करें

बहोत खूब। ......सुन्दर गजल 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 10, 2017 at 12:38pm
वाह आदरणीय वाह बेहतरीन..सादर
Comment by Mohammed Arif on May 10, 2017 at 12:01pm
वल्लाह कमाल!वल्लाह कमाल !! मुरस्सा ग़ज़ल!मुरस्सा ग़ज़ल!!सीख भी है, सहजता भी है ,उस्तादों वाला अंदाज़ भी है ।
ढेरों मुबारकबाद आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ।
Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 10, 2017 at 10:55am

वाह, बेहतरीन शेर हुए हैं आदरणीय  समर कबीर जी 

पहले अपनी रूह का ये मक़बरा रोशन करें
और इसके बाद हम सोचें कि क्या रोशन करें

आम कर दीजे 'ज़फ़र' साहिब के इस पैग़ाम को
"इक दिया जब साथ छोड़े, दूसरा रोशन करें

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 10, 2017 at 10:44am

वाह वा आ. समर सर ... बहुत ख़ूब ग़ज़ल/....
मतले ने बाँध रखा है ...
ग़ज़ल के सभी अशआर उम्दा हैं.... 
बधाई 

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