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ग़ज़ल -डरता हूँ घर जले न कहीं इस शरर से, मैं -- ( गिरिराज भंडारी )

221    2121     1221       212

तंग आ गया हूँ हालते क़ल्ब-ओ-ज़िगर से मैं

उकता गया हूँ ज़िंदगी, तेरे सफर से मैं

 

होश ओ हवास ओ-बेख़ुदी की जंग में फ़ँसे

दिल सोचने लगा है कि जाऊँ किधर से मैं

 

मंज़िल मेरी उमीद में जीती है आज भी
पर इलतिजाएँ कर न सका रहगुज़र से मैं

 

ऐसा नहीं गमों से है नाराज़गी कोई

उनकी ख़बर तो लेता हूँ शाम-ओ-सहर से मैं

 

अब नफरतों, की शक़्ल भी आतिश फिशाँ हुईं

डर है झुलस न जाऊँ कहीं इस शरर से मैं

 

जब जब हवायें तुँद हुई डर के छिप गया
उक्ता गया हूँ अब तो मियाँ हमसफ़र से मैं

***************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 11, 2017 at 9:16pm

आदरणीय बृजेश भाई , हौसला अफज़ाई का शुक्रिया ।

Comment by vijay nikore on January 11, 2017 at 1:24pm

 गज़ल में हमेशा की तरह बहुत ही खूबसूरत ख्याल पिरोय हैं। बधाई, आदरणीय भाई गिरिराज जी।

Comment by नाथ सोनांचली on January 9, 2017 at 3:43am
आद0 गिरिराज भाई जी सादर अभिवादन, आपकी ग़ज़ल। बहुत उम्दा और दमदार बन पड़ी है, शैर दर शैर दाद हाजिर है, मुबारकबाद कबूल फरमाएँ।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 8, 2017 at 11:30pm

आदरणीय गिरिराज जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने। शेर-दर-शेर दाद कुबूल फरमाएं


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 8, 2017 at 9:35pm

आदरणीय गिरिराज सर, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. शेर-दर-शेर दाद के साथ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. इस मिसरे पर पुनर्विचार निवेदित है- 

मंज़िल ! मेरी उमीद यूँ जीती है अब भी पर-----> मंज़िल ! मेरी उमीद यूँ जीती है लेकिन अब 

एक  मिसरा बेबहर हो गया है- 

उनकी खबर लेता रहा शाम-ओ-सहर से मैं

221 /2221/1221/212

ऐसा नहीं गमों से है नाराज़गी कोई

उनकी ही तो खबर में लगा हूँ सहर से मैं

सादर 

Comment by Samar kabeer on January 8, 2017 at 9:26pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,मतला ज़ोरदार है, लेकिन मेरे ख़याल से ग़ज़ल कुछ और समय चाहती थी,आपने शायद आपने जल्दबाज़ी की है, ख़ैर,आपने मुझे इजाज़त दे रखी है,इसलिये कुछ अर्ज़ करता हूँ ।
दूसरे शैर के ऊला मिसरे में'फंसा'जगह "फँसे"कर लीजिये, क्योंकि 'होश-ओ-हवास"बहुवचन है ।
तीसरे शैर को यूँ कीजिये,रवानी में आजायेगा और भाव भी नहीं बदलेगा:-
"मंज़िल मेरी उमीद में जीती है आज भी
पर इलतिजाएँ कर ह् सका रहगुज़र से मैं"
चौथे शैर का सानी मिसरा यूँ कर लें,लय में आजायेगा:-
"उनकी ख़बर तो लेता हूँ शाम-ओ-सहर से मैं"
पांचवें शैर का सानी मिसरा यूँ कर लें,रदीफ़ से इंसाफ़ नहीं हो रहा:-
"डर है झुलस न जाऊँ कहीं इस शरर से मैं"
आख़री शैर का सानी मिसरा यूँ कर लें:-
"उक्ता गया हूँ अब तो मियाँ हमसफ़र से मैं"
इस प्रस्तुति पर बधाई सीकर करें
Comment by दिनेश कुमार on January 8, 2017 at 7:01pm
उम्दा ग़ज़ल के लिए दिली दाद आ गिरिराज सर। वाह वाह
तीसरे और चौथे शेर में गुंजाइश लगती है सर।
3रे के ऊला में ...lekin ki bajaaye पर ka prayog akhartaa hai.
४थे में रदीफ़ सही नहीं निभता लग रहा सर। सादर।
Comment by दिनेश कुमार on January 8, 2017 at 7:01pm
उम्दा ग़ज़ल के लिए दिली दाद आ गिरिराज सर। वाह वाह
तीसरे और चौथे शेर में गुंजाइश लगती है सर।
3रे के ऊला में ...lekin ki bajaaye पर ka prayog akhartaa hai.
४थे में रदीफ़ सही नहीं निभता लग रहा सर। सादर।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 8, 2017 at 4:06pm
आदरणीय गिरिराज भाई साब कमाल की ग़ज़ल हुयी है उर्दू के शब्दों कक भी प्रयोग चार चाँद लगा रहा है इस शानदार ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 8, 2017 at 2:23pm
वाह आदरणीय बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही है..मेरे लिए ये काफी कठिन मापनी है..कोशिश करूँगा कुछ लिख सकूँ..

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