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सकल दुख तरल रूप में आज वर्षित---ग़ज़ल, पंकज मिश्र

122 122 122 122
घनीभूत पीड़ा मनस व्योम क्षोभित
सकल दुख तरल रूप में आज वर्षित

अभीप्सा सुमन पर है मूर्च्छन प्रभावी
है निर्जीव सा तन हृदय ताल बाधित

कहाँ चाँदनी से क्षितिज था चमकना
कहाँ दामिनी ने किया पूर्ण भस्मित

पुनः लेखनी आज मानी न आज्ञा
गजल में किया है तुम्हें फिर सुशोभित

सजल चक्षुओं में कहाँ नींद होगी
निशा एक फिर से हुई तुझको अर्पित

न उद्देश्य किंचित भी चर्चा का लेकिन
तेरे नाम का मन्त्र बांचे पुरोहित

अमिय प्रीत की कामना थी अमित पर
गरल स्वार्थ का दान पंकज को प्रेषित

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 3:56am
सभी शैर अच्छे हुए हैं भाई पंकज मिश्र जी हिंदी शब्दों का संयोजन भी अच्छा हुआ है।इसके लिए दिल से बधाई लीजिये। संस्कृतनिष्ठ शब्दों के बीच चांदनी शब्द कुछ कम जंच रहा है इसके स्थान पर समान मात्रा भार के 'चंद्रिका' शब्द को प्रयुक्त कर सकते हैं।
पुनः आज्ञा लेखनी ने न मानी। .........इस पंक्ति में वह्र भंग प्रतीत हो रहा है 'पुनः' में आपने मात्रा भार क्या लिया है?

बाकी सब शुभ शुभ
Comment by Samar kabeer on October 8, 2016 at 5:13pm
अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 8, 2016 at 3:34pm
आदरणीय पंकज जी खूबसूरत सी रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सादर ।
Comment by Sushil Sarna on October 8, 2016 at 12:32pm

सजल चक्षुओं में कहाँ नींद होगी
निशा एक फिर से हुई तुझको अर्पित

अति अति सुंदर ... भावों का शब्द अलंकरण किसी भी हृदय को आनंदित कर सकता है ... इस अप्रतिम ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय पंकज जी।

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