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पीड़ा तू आ (कविता) : कांता रॉय

पीड़ा तू आ
आ तेरा श्रृंगार करूँ
शब्दों के फूलों से
टूटे अंतरंगों को सजा लूँ
पीड़ा तू आ
तुझे हृदय में बसा लूँ

बौने मन की कद- काठी पर
प्रीत की लम्बी बेल चढ़ाई
लतर - चतर कर उलझ गई
ये कैसी मैने खेल रचाई
पीड़ा तू आ
तुझे पलकों पर बिठा लूँ

गर्द -गर्द धूमिल- सी चाँदनी
चाँद का रूप कितना मैला
रौंद कर सपनों को
टिड्डों का देखो दल निकला
पीड़ा तू आ
तुझे अधरों का सुख दूँ

सागर की उन्मुक्त लहरें
बदली का यूँ ही घिरना
पत्थर जो गल कर बर्फ बने
गर्म उँसासों का जम जमकर जमना
पीड़ा तू आ
तुझे मन महुए का नशा करा दूँ

वह कदंब का फूल शस्त्र-सा
शूल सा चुभता भ्रष्ट बसंत
गर्मी है अब सर्द-सर्द-सी
धुप झुलस कर हो गई पस्त
पीड़ा तू आ
तुझे इच्छाओं का माँस खिला दूँ

हड्डियों के ढाँचे में
कर्ज़ कर्ज़ डूबा स्वार्थ
अंधेरों का बढ़ता आकार
घट कर पलछिन हुआ उजास
पीड़ा तू आ
तुझे वाणी की आँख दूँ ॥

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on July 3, 2016 at 10:49am
कास प्रभु कीजै तोरी सेव
21 11 22 21 21 =15 मात्रा

क्या यह मात्रा गणना सही है?
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on July 3, 2016 at 10:46am
आदरणीया कान्ता राॅय जी बहुत ही सुन्दर रचना बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 3, 2016 at 8:40am
आ. कान्ता रॉय जी ख़ूबसूरत भावों से सजी रचना हेतु बधाई, स्वीकार करें
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 30, 2016 at 8:21pm

बहुत ही सुंदर

Comment by रामबली गुप्ता on June 28, 2016 at 2:04pm
भावों का अनुपम सम्प्रेषण आद0 कांता राय जी। बहुत सुंदर रचना हुई है। क्या आपने अतुकांत में प्रयास किया है?

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 28, 2016 at 9:55am

गर्द -गर्द धूमिल- सी चाँदनी
चाँद का रूप कितना मैला
रौंद कर सपनों को
टिड्डों का देखो दल निकला
पीड़ा तू आ
तुझे अधरों का सुख दूँ

अन्यमनस्क मन जीवन की विसंगतियों का जहर पीते पीते इतना विचलित हो जाता है तथा पीड़ा को ही नियति मानकर उसी के स्वागत में बिछ जाता है उन्ही भावों को जिया है आपने इस शानदार प्रस्तुति में आद० कांता जी 

ये कैसी मैने खेल रचाई-----खेल के साथ रचाया आएगा 

ये कैसी क्रीडा  हाय रचाई--कर सकती हैं 

बहुत सुन्दर प्रस्तुति... हार्दिक बधाई आपको |

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 28, 2016 at 9:37am
पीड़ाओं का आगमन, बधाई , आदरणीय कान्ता रॉय जी , सुन्दर , कुछ है कर प्रस्तुति , सादर।
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 28, 2016 at 9:17am

बहुत ही सुंदर रचना मुखरित हुई है. हार्दिक बधाई आदरणीया कांता राय जी...सादर

Comment by pratibha pande on June 28, 2016 at 8:50am

वह कदंब का फूल शस्त्र-सा
शूल सा चुभता भ्रष्ट बसंत
गर्मी है अब सर्द-सर्द-सी
धुप झुलस कर हो गई पस्त
पीड़ा तू आ
तुझे इच्छाओं का माँस खिला दूँ...... पीड़ा का ऐसा आवाह्न कि आ जब तेरे सिवा और कुछ है ही नहीं तो तू ही सही   सशक्त अभिव्यक्ति है  ये आपकी    हार्दिक बधाई प्रेषित है आपको आदरणीया कांता जी 

Comment by Sushil Sarna on June 27, 2016 at 4:33pm

गर्द -गर्द धूमिल- सी चाँदनी
चाँद का रूप कितना मैला
रौंद कर सपनों को
टिड्डों का देखो दल निकला
पीड़ा तू आ
तुझे अधरों का सुख दूँ

वाह आदरणीया कांता रॉय जी अंतरमन के अंतर्द्वंद को बहुत ही सुंदरता से आपने अपनी इस रचना में उकेरा है। इस मधुर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।

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