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आत्मा में आकर ही बसो (कविता)

मेरी यादों में मृत्यु
अब भी जीवित रहता है
मरने के बाद भी
जीने की पुरजोर कोशिश में
बार -बार मरता रहता है
जाने कैसे मर कर वो ज़िंदा रहता है।

तुम तो गए ,
दूर पहाड़ों के उस पार
आसमान के अनंत विस्तार से कहीं बहुत आगे
मैं रह गयी यहाँ गाँव में अकेली
नदी ,पहाड़ और
आषाढ़ की जलती ,दग्ध करती हुई जलती बूंदों  में घिर कर।

अँधेरे गहरे काले साए
मृत्यु के पश्चात भी
मिलन की आकांक्षा जगा जाते है
आत्मा हो ,आत्मा में आकर ही बसो
मिलन का रूप चाहे कैसा भी हो
मिलन के त्रास का मिटना जरुरी है।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by kanta roy on August 4, 2016 at 12:13pm
मेरे अंतर्मन की संवेदना आप तक पहुँच पाया , इस बात ने मेरे प्रयास को सार्थकता दी है। आभार हृदय से।
Comment by Sushil Sarna on July 2, 2016 at 1:29pm

अादरणीय कांता रॉय जी अतर्मन के भावों को बहुत सुंदर संप्रेषण हुअा है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें। 

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