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एक तुम्हारे होने से / कविता

साक्षी है सिंधू मन मेरा एक तुम्हारे होने से
हृदय की भित्तियों में चित्तियाँ तुम्हारे होने से

ऊँची काली दीवारें थाह पता कोई ना जाने
जीने -मरने में भेद मिटा संत्रासों के ढोने से
हृदय की भित्तियों में चित्तियाँ तुम्हारे होने से .......

उलट-पुलट है यह जग सारा पुरवाई भी व्याकुल है
लहरों की उछ्वासित साँसों को क्या मलाल अब खोने से
हृदय की भित्तियों में चित्तियाँ तुम्हारे होने से ........

लय की अनंतता में अंतर्मन का रमकर रमना
नित्य-निरंतर उसके गति में अविचलता के होने से
हृदय की भित्तियों में चित्तियाँ तुम्हारे होने से .........

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 2:30pm
आभार आपका हृदय से आदरणीया अल्का जी।
Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 2:29pm
आदरणीय विजय जी ,हमेशा से आपको पढ़ती आई हूूँ मंच पर। संवेदनाओं का निर्वाह आपसे बेहतर शायद ही कोई कर सके। आपका रचना पर उपस्थिती मेरे मनोबल को बढ़ा गया है।आभारी हूूँ।
Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 2:26pm
आभारी हूूँ आपकी आदरणीय आशीष जी।
Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 2:25pm
रचना पसंदगी के लिये हृदय से आभार आपका आदरणीय सतविन्द्र जी।
Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 3, 2016 at 4:21pm

भाव पूर्ण सुंदर रचना

Comment by vijay nikore on August 22, 2016 at 3:56pm

अति सुन्दर, अति मनमोहक रचना के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीया कांता जी

Comment by ASHISH KUMAAR TRIVEDI on August 8, 2016 at 11:19am
भाव पूर्ण सुंदर रचना
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 4, 2016 at 6:37pm
बहुत् सुन्दर भावाभिव्यक्ति।नमन वन्दनीया।
Comment by kanta roy on August 4, 2016 at 12:11pm
रचना को मान देने के लिये आभार आपका आदरणीय पवन जी।
Comment by kanta roy on August 4, 2016 at 12:10pm
आभार आपका दिल से आदरणीया कल्पना जी रचना पसंदगी के लिये।

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