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मुखौटे (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

 ‘बेशक हमारे भाई साहिब को देश छोड़े एक अर्सा हो गया यू.एस.ए. में उन्होनें अपना बिजनेस एम्पायर खड़ा कर लिया है पर उन्हें अपने देश और अपनी संस्कृति से अब भी बहुत प्यार है। इसलिए वो अपने बेटे के लिए मेम नहीं बल्कि एक सुसंस्कृत भारतीय बहू चाहते है।’ शहर के नामचीन बिल्डर अपनी डाॅक्टर पत्नी सहित मेयर साहिब के घर उनकी इकलौती बेटी के लिए अपने भतीजे के रिश्ते के सिलसिले के लिए बतिया रहे थे।

‘यह तो बहुत अच्छी बात है। मेरी बहन व बहनोई भी यू.एस.ए. सिटीज़न हैं । वो आपके भाई साहिब को बहुत अच्छी तरह से जानते है। जब उन्हे आपके भाई साहिब की इच्छा के बारे में पता चला तो उन्होनें मेरी बिटिया के बारे में उनसे बात की।’

‘जेठ जी ने यह जिम्मेवारी हमारे उपर डाल दी है । रात उनका फोन आया और उन्होनें आपके परिवार और लड़की के बारे में पूछा तो मैनें तो उसी वक्त उन्हें कह दिया था कि वहां तो आंखे मूंद कर रिश्ता किया जा सकता है और लड़की भी एकदम खरा सोना है।’

‘ये तो आप लोगों की ज़र्रानवाज़ी है, जिसके लिए मैं सदैव कृतज्ञ रहूंगा। बेटी अच्छे घर में चजी जाए तो इसकी माँ की आत्मा को भी शांति मिल जाएगी । अच्छा भाई साहिब अगले महीने जो माॅल बन रहा है उसके लिए आपने टेंडर भरा कि नहीं?’

‘नहीं अभी तो नहीं भरा। कुछ अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं कि दूसरे लोग क्या रेट ‘कोट’ करेंगे।’

‘आप फिक्र न करें, परसों शाम को आ जाइए, डिनर भी हो जाएगा और आपको दूसरे लोगों के टेंडर भी दिखा दूंगा, उस हिसाब से आप अपना टेंडर तैयार कर लीजिएगा।’

‘भाई साहिब ! मेरे क्लीनिक की उपरी मंजिल के निर्माण लिए आपके दफतर से ‘क्लीयरेंस’ सर्टीफिकेट चाहिए था, आप जरा उसे भी देख लेते...।’ डाॅक्टर साहिबा भला कैसे पीछे रहती

‘बहन जी ! आप जब परसों डिनर के लिए आएंगी तो आपका ‘क्लीयरेंस’ सर्टीफिकेट भी आपके हाथ में होगा, आप बेफ्रिक रहिए। ’

‘अच्छा मेयर साहिब ! अब इजाज़त दीजिए। परसों शाम को मिलते हैं।’

‘बहन जी ! आपके सभी काम हो जाएंगे पर यू.एस.ए. तक ये खबर न पहुंचे कि आप मेरी बेटी का अबाॅर्शन भी कर चुकी हैं...।’ दरवाज़े तक छोड़ते हुए मेयर साहिब धीरे से डाॅक्टर साहिबा के कान में फुसफुसाए

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 5, 2016 at 5:46pm

हाई प्रोफाइल लोगों की असलियत | बहुत ही बढ़िया कथा हुई है आदरणीय | हार्दिक बधाई |

Comment by pratibha pande on December 22, 2015 at 11:36am

 नकाबों को अच्छा बेनकाब किया है आपने आदरणीय , हार्दिक बधाई आपको इस शानदार रचना पर आदरणीय रवि जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2015 at 10:37pm

ग़ज़ब का वार्तालाप ! तो ये हैं तथाकथित उच्च (लोगों के) संस्कार ! बातचीत के ताने-बाने से ढोंग को बढिया उजागर किया गया है. 

हार्दिक बधाई, अनुज रवि जी. शुभकामनाएँ 

Comment by Nita Kasar on December 20, 2015 at 9:05pm
अपनी कमज़ोरियाँ छुपाने के लिये कितने मुखौटे लगा लेते है लोग ये ऊँचे लोगों ने विवाह को फ़ायदे का सौदा बनाकर रख दिया ।बड़े लोगों के असली चेहरे एेसे भी बधाई आपको आद०रवि प्रभाकर जी ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 20, 2015 at 9:11am
हृदयतल से बधाई आपको आदरणीय सर जी
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 20, 2015 at 6:43am
बहुत बहुत बहुत अच्छी रचना।हाई प्रोफाइल लोगों की वास्तविकता व्यवहार को उजागर करती हुई।हार्दिक आभार आदरणीय रवि सर।
Comment by Janki wahie on December 20, 2015 at 6:38am
सामाजिक ताने बाने के खोखलेपन को उजागार करती बेहतरीन लघुकथा।हार्दिक बधाई।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 19, 2015 at 3:41pm
व्यावहारिकता, व्यावसायिकता व स्वार्थपरकता से रंगे मुखौटों का सुंदर सार्थक सटीक चित्रण। हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय रवि प्रभाकर जी ।
Comment by kanta roy on December 19, 2015 at 3:37pm

 पढते ही मन वितृष्णा से भर उठा । आज के बदलते सामाजिक परिदृश्य , जहाँ नैतिक मुल्यों का ह्वास हो रहा है । अब हमारे घरों में और रिश्तों पर भी भ्रष्टाचार नये मुखौटे में पदार्पण कर चुकी है ।
दहेज का सामाजिक विरोध सफल हो रहा है काफी हद तक लेकिन दुसरी तरफ वह रूप बदल कर अब , शादियाँ बिजनेस एग्रीमेंट के रूप में व अन्य विविध शक्लों को अख्तियार कर रही है ।
समाज की कुत्सित मनःस्थिति पर तंज कसती हुई एक शानदार लघुकथा आपकी । 
पढकर मन आनंद - आनंद हो उठा । 
बधाई ? ना ,ना , शत - शत अभिनंदन आपको आदरणीय रवि जी ।

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