For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

सिसकियां (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

‘चल अब छोड़, जाने भी दे! इसमें इतना रोने की क्या बात है, यह कोई नयी बात थोड़े ही है। हम जैसे लोगों के साथ तो ये हमेशा से ही होता आया है। तू इतने टेसुए क्यों बहा रही हो ? वैसे गल्ती भी तेरी ही है, अगर तुझे प्यास लगी थी तो अपने पीने का पानी बाहर ही तो रखा होता है फिर तू रसोईघर में क्यों गई ?’ सिसक रही अपनी पत्नी को वो दिलासा दे रहा था।

‘मैं तो यही सोच कर इनके यहां काम करने को लगी थी कि चलो पढ़-लिख कर अफसर बन गए है तो क्या हुआ, हैं तो ये हम लोगों में से ही ना। पर ये लोग... कोई और हमारे साथ कैसे भी बर्ताव करें कोई फर्क नहीं पड़ता पर ये अपने होते हुए भी....।’ उसकी सिसकियां और गहराने लगीं।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 642

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 5, 2016 at 5:41pm

अपने ही तो घाव देते है | बहुत सुंदर कथा हुई है आदरणीय रवि सर | हार्दिक बधाई |

Comment by kanta roy on February 4, 2016 at 11:28pm

हाँ , ये सच है की दुःख तो अपने लोगों के ही व्यवहार से होता है। हमेशा की तरह बेहद सधे  हुए ,  बहुत ही गहरे प्रभाव के साथ ,  तंज कायम किया  है यहां आपने  आदरणीय रवि जी । बधाई प्रेषित है।  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 21, 2016 at 7:35pm

आदरणीय रवि भाई , अशारों मे आपने बहुत गँभीर और कड़वा सच कह दिया ! लघुकथा के लिये आपको हार्दिक बधाई । 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 21, 2016 at 6:05pm
वाआह्ह्ह्ह्ह्!बेहतरीन सन्देश का सम्प्रेषण हुआ है आदरणीय सर जी।एक नवीन कुप्रथा जो प्राचीन कुप्रथा से प्रेरित है।सादर हार्दिक बधाई इस अद्भुत रचना के लिए।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 20, 2016 at 8:58pm

आदरणीय रवि जी, गहन और प्रभावोत्पादक लघुकथा हेतु हार्दिक बधाई 

Comment by pratibha pande on January 20, 2016 at 12:19pm

 कम शब्दों में बहुत गूढ़ अर्थ संप्रेषित करती इस लघु कथा पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय रवि प्रभाकर जी 

Comment by TEJ VEER SINGH on January 19, 2016 at 12:52pm

हार्दिक बधाई अदरणीय रवि प्रभाकर जी!बेहतरीन प्रस्तुति!

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 19, 2016 at 10:50am
वाााह.....
// ... कोई और हमारे साथ कैसे भी बर्ताव करें कोई फर्क नहीं पड़ता पर ये अपने होते हुए भी....।//...बेहतरीन पंचपंक्ति के साथ बेहतरीन संदेश वाहक अनुपम कृति के लिए बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय श्री रवि प्रभाकर जी। मूल समस्या हल होने के बजाए अपने नये तुच्छ रूप लेती जा रही है। अपने ही अपनों के साथ ऊंच-नीच/छुआछूत का बर्ताव करने से नहीं चूकते!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service