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2122 2122 2122
लग गये दिल चाँद अब धरती उतारें।
ठान ली है आ यहीं सरसी उतारें।
खूब मचली हैं घटायें झूमती- सी
आ अभी उनको जली परती उतारें।
सूखती जो दूब भी अब चाहती है
जिंदगी कुछ पल अभी मरती उतारें।
आरजू तब की हमारी माँगती कुछ
अब तलक घातें रहीं ठगती उतारें।
हो चुकी बातें बहुत बोलूँ कहूँ क्या
हो गयी जो बात अब जगती उतारें।
मौन आँखों से भिंगोने थी चली वह
रह गयी जाने कहाँ चरती उतारें।
ख्वाहिशें अबतक थमी थीं नामुरादें
रे नहीं फिर वे भड़क बुझती उतारें।
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 9, 2015 at 11:51am

आंचलिकता को विस्तार मिला है आदरणीय

शुभकामनाएँ.. 

Comment by Manan Kumar singh on September 8, 2015 at 10:50pm
आभार आपका शकूर जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 8, 2015 at 10:41pm
अच्छा प्रयास है मननजी
Comment by Manan Kumar singh on September 8, 2015 at 8:01pm
आभार मिथिलेश जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 8, 2015 at 6:39pm
बधाई इस प्रस्तुति पर।

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