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हर तरफ आखिर हँसी छा गयी है
आज कौवे को चिड़ी भा गयी है।

काँव कितनी बार करता रहा वह,
ठाँव उसके आज मैना गयी है।

टक लगा बगुला रहा था कभी से,
चोंच मछली एक छलक आ गयी है।

देख वंशी है लगी हो कहीं कुछ,
लोग बोलें टोना' ले जा गयी है।

साँढ़ बूढ़ा कुलबुलाया शहर में,
देख बछिया खुद अचंभा गयी है।

विश्व-जय सी हो गयी तो अभी है
कंत-घर अमृत नवोढ़ा गयी है।

बाग़ में बुलबुल अभी गा रही थी,
क्यूँ न जाने चुप हवा छा गयी है।

"मौलिक व अप्रकाशित"@मनन
(2122 2122 122)
'=मात्रा पतन

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Comment by Manan Kumar singh on September 8, 2015 at 10:46pm
आदरणीय करुण जी,रचना में इतनी गहरी पैठ आपके आशीर्वाद को द्योतित करती है और साथ ही शायद संवेदना की व्यापकता को भी।वैसे सवेदनाएं लौकिकता के आईने में झाँकती तो हैं ही,सादर।
Comment by Santlal Karun on September 8, 2015 at 6:45pm

आ. मनन कुमार जी,

आप ने अच्छी हिन्दी ग़ज़ल कही है, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ स्वीकारें | पर लगता है इस ग़ज़ल की अभिव्यंजना में राष्ट्रीय समाचारों में चर्चित कौवे-मैना की ताज़ा घटना निहित है | हो सकता है यह रचना की संवेदना की व्यापकता हो या संयोग या मेरा भ्रम ...यह तो आप ही स्पष्ट कर सकते हैं | खैर .. पुन: साधुवाद !

Comment by Manan Kumar singh on September 7, 2015 at 10:28pm
आदरणीय रवि जी, प्रयास रहता है,सादर।
Comment by Ravi Shukla on September 7, 2015 at 2:46pm

आदरणीय मनन जी , बधाई शिल्‍प पर आपका अभ्‍यास अच्‍छा है ।

Comment by Manan Kumar singh on September 7, 2015 at 10:19am
टोना=मछली पकड़ने में वंशी में फँसाया गया खाद्य पदार्थ

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