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कला गीतिका-दौर गम का ये पिघलने दो जरा

बहरे रमल मुसद्दस महजूफ
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 212
--------------------------
हसरतें बेताब जलने दो ज़रा।
दौर गम का ये पिघलने दो जरा।
*****
मन जला है तन जला है इश्क में,
प्यार की अब साँझ ढलने दो ज़रा।
*****
प्यास होठों को सुखाये जा रहा,
भर नजर से जाम चलने दो ज़रा।
*****
होश में हम रोज रोते ही रहें,
अश्क पीकर आज हँसने दो ज़रा।
*****
आ उजाड़ो शौक से ऐ आँधियों,
बस्तियां दो चार बसने दो ज़रा।
******
आप बैठो और लेटो बात क्या,
बस मुझे भी पाँव रखने दो ज़रा।
*****
तोड़ जाते हो चमन के फूल क्यों,
छोड़ दो गुलशन महकने दो ज़रा।

मौलिक एवं अप्रकाशित रचना।
राय सादर स्वीकार्य है।

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Comment by shree suneel on June 13, 2015 at 9:05am
तोड़ जाते हो चमन के फूल क्यों,
छोड़ दो गुलशन महकने दो ज़रा।... ख़ूब
अच्छी ग़ज़ल आदरणीय. बधाई आपको.
Comment by वीनस केसरी on June 12, 2015 at 11:16pm

वाह बहुत खूब ...
समर साहब की इस्लाह से एक शेर जिसमें कुछ कमी थी वो भी दुरुस्त हो गया ...

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on June 12, 2015 at 8:29pm
आदरणीय गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी बेहद शुक्रिया सुझाव के लिये।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on June 12, 2015 at 8:27pm
जनाब समर कबीर जी इस्लाह के लिये तहेदिल शुक्रिया आपका।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 12, 2015 at 8:03pm

 आ० सुनीलजी

बहुत सुन्दर गजल मन जला है तन जला है इश्क में,
प्यार की अब साँझ ढलने दो ज़रा।
*****
प्यास होठों को सुखाये जा रहा,----------------रही करने से तकाबुले रदीफ़ भी दूर हो जायेगा
भर नजर से जाम चलने दो ज़रा।
*****
होश में हम रोज रोते ही रहें,
अश्क पीकर आज हँसने दो ज़रा।

Comment by Samar kabeer on June 12, 2015 at 7:10pm
जनाब सुनील प्रसाद जी,आदाब,आपकी गीतिका पसंद आई लेकिन एक मतला और दो शैर में आपने क़ाफ़िये जलने ,पिघलने ,चलने लिये हैं और बाक़ी अशआर में बसने ,महकने आदि. क़ाफ़िये लिये हैं ,

"प्यास होठों को सुखाये जा रहा"

ये मिसरा इस तरह लिखना उचित होगा :-

"प्यास होठों को सुखाये जा रही"

बाक़ी शुभ शुभ ।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on June 12, 2015 at 2:29pm
तारीफ और हौसलाफजाई के लिये शुक्रिया जनाब नरेन्द्र सिंह चौहान जी आपका।
Comment by narendrasinh chauhan on June 12, 2015 at 11:05am

हसरतें बेताब जलने दो ज़रा।
दौर गम का ये पिघलने दो जरा।

होश में हम रोज रोते ही रहें,
अश्क पीकर आज हँसने दो ज़रा।

तोड़ जाते हो चमन के फूल क्यों,
छोड़ दो गुलशन महकने दो ज़रा।  लाजवाब सर

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on June 12, 2015 at 8:47am
सादर आभार आदरणीय मनोज कुमार अहसास जी।
Comment by मनोज अहसास on June 12, 2015 at 7:23am
बहुत खूब

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