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ग़ज़ल -- मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है ( गिरिराज भंडारी )

मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है

**************************************

1222    1222    1222     122 

न आये होश अब यारों नशा छाया हुआ है  

सँभल ऐ बज़्म दिल अब वज़्द में आया हुआ है

 

ज़रा राहत की कुछ सांसें तो लेलूँ मैं ,कि सदियों

बबूलों को मनाया हूँ तो अब साया हुआ है 

 

हथौड़ा एक तुम भी मार दो लोहा गरम पर

यहाँ मज़हब को ले के खून गरमाया हुआ है

 

अँधेरा बांट के भी रोशनी का मुंतज़िम , वो

तुम्हें किसने कहा, ग़मगीन, शर्माया हुआ है ?

 

सुना है आइनों की बस्ती में फिर कोई पत्थर

वहाँ की तेवरी से खूब घबराया हुआ है

 

कि अब सरकश तराने का कोई आगाज़ भी हो 

मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है

 

मुझे बज़्मे तरब की रोशनी में मत घसीटो

मेरे अन्दर का सन्नाटा मुझे भाया हुआ है

******************************************** 

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on November 19, 2014 at 6:01pm
सुना है आइनों की बस्ती में फिर कोई पत्थर
वहाँ की तेवरी से खूब घबराया हुआ है

बहुत खूब। बधाई आदरणीय गिरिराज भंडारी जी ,

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 19, 2014 at 4:53pm

बहुत सुन्दर मतला ..क्या कहने 

हथौड़ा एक तुम भी मार दो लोहा गरम पर-----हथौड़ा एक तुम भी मार दो है गर्म लोहा ---करें तो कैसा रहे ?

सुना है आइनों की बस्ती में फिर कोई पत्थर

वहाँ की तेवरी से खूब घबराया हुआ है---वाह वाह 

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल हुई है आ० गिरिराज जी दाद कबूलें 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 19, 2014 at 2:30pm

आदरनीय श्याम भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका आभार !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 19, 2014 at 2:29pm

आदरणीय योगराज भाई , विस्तार से गज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया पढ के आनन्द हुआ ! आपकी सलाह उचित है ,मै सुधार कर लूंगा , आपकी सराहना ने गज़ल कहना सार्थक कर दिया ! आपका दिली शुक्रिया !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 19, 2014 at 2:26pm

आ, बड़े भाई गोपाल जी , आपकी स्नेहिल सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ।

Comment by Shyam Narain Verma on November 19, 2014 at 2:00pm

बहुत  ही सुन्दर प्रस्तुति  //हार्दिक बधाई आपको 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 19, 2014 at 12:23pm

//न आये होश अब यारों नशा छाया हुआ है  
सँभल ऐ बज़्म दिल अब वज़्द में आया हुआ है// बहुत ही प्यारा मतला।

//ज़रा राहत की कुछ सांसें तो लेलूँ मैं ,कि सदियों
बबूलों को मनाया हूँ तो अब साया हुआ है // "बबूलों को मनाया हूँ " भाषाई दृष्टि से दुरुस्त नहीं है, "हूँ" को "हां" कर ले।   

//हथौड़ा एक तुम भी मार दो लोहा गरम पर
यहाँ मज़हब को ले के खून गरमाया हुआ है// बहुत खूब.

//अँधेरा बांट के भी रोशनी का मुंतज़िम , वो
तुम्हें किसने कहा, ग़मगीन, शर्माया हुआ है ?// लाजवाब शेअर।

//सुना है आइनों की बस्ती में फिर कोई पत्थर
वहाँ की तेवरी से खूब घबराया हुआ है // क्या कहने है - बढ़िया शेअर हुआ है।

//कि अब सरकश तराने का कोई आगाज़ भी हो
मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है // वाह वाह वाह - बहुत खूबसूरत शेअर।

//मुझे बज़्मे तरब की रोशनी में मत घसीटो
मेरे अन्दर का सन्नाटा मुझे भाया हुआ है  // बहुत खूब।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 19, 2014 at 12:21pm

सुभान अल्लाह  ! क्या उम्दा गजलगोई है i एक एक अशआर मोती  के मानिंद है  i बधाई अनुज  i

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