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2122    2122    2122    2122

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चल  पड़ी नूतन  हवा  जब से शहर की ओर यारो
गाँव के  आँगन उदासी,  भर  रही  हर  भोर यारो
**
अब  बुढ़ापा द्वार  पर  हर  घर  के बैठा है अकेला
खो  गया  है  आँगनों से   बचपनों  का  शोर यारो
**
ढूँढते तो हैं  शिरा  हम, गाँव  जाती  राह का नित
पर  यहाँ  जंजाल  ऐसा  मिल  न पाता छोर यारो
**
हो गये कमजोर रिश्ते, अब दिलों के धन की खातिर
मंद   झोंके   भी   चलें  तो   टूटती   हर   डोर  यारो
**
हद से जादा भी उजाला, भय जगा  देता है मन में
ये  कहा  किसने,  जगाता  भय  अँधेरा  घोर यारो
**
कोसते रावण को  हर दिन, चल पड़े  जो पथ उसी के
किस हवस ने कर दिया अब, आचरण कमजोर यारो
**
सोच  लेना तुम मनुजता, है  अभी जीवित जगत में
देख   बेबस  की  दशा  यदि  नम  हुई  है  कोर यारो
**
क्या  सिनेमा  से  प्रभावित हम हुए हिंसा के आदी ?
अन्यथा  अब  कत्ल  तक देते कहाँ झकझोर यारो
**
रो रहा है जो ‘मुसाफिर’, भीड़ से  छुप के कहीं गर
सच थकन से तो नहीं पर, दुख से दुखता पोर यारो
**


मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर‘

***  

यह गजल आ0 भाई सौरभ जी के मार्गदर्शन में पूरी की गयी है । उनकी बेसकीमती सलाह के लिए मैं उनका आभारी हूँ । उन्होंने अपना कीमती समय मेरा मार्गदर्शन करने में लगाया इसके लिए उनका हार्दिक धन्यवाद ।

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 23, 2014 at 10:19am


आदरणीया मंजरी जी, गजल को इतना अधिक मान देने के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 23, 2014 at 10:19am


आदरणीय भाई जवाहरलाल जी, गजल पर आपकी उपस्थिति से प्रसन्नता हुई । आपने सही कहा हमें रास्ते सुझाई नहीं दे रहे । या फिर यों भी कह सकते हैं कि हम मार्ग तलाशने का प्रयत्न ही नहीं कर रहे । हम यथास्थिति के इतने आदी हो गये हैं कि किसी भी बदलाव के लिए सहज तैयार ही नहीं होते । फिर भी आशा करनी ही होगी कि वह भोर अवश्य आयेगी जिसमें हमें रास्ते सुझाई देगे ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 23, 2014 at 10:18am


आदरणीय भाई गोपाल नारायन जी , सदर अभिवादन । आपका स्नेहाशीष और प्रशंसा पाकर अति प्रसन्नता हुई । गजल में निहित कमियों के विषय में भी मार्गदर्शन करते रहिए । शुभ- शुभ ......

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 23, 2014 at 10:18am


आदरणीय भाई सुशील सरना जी , गजल को इतना मान देने के लिए हार्दिक धन्यवाद । ओ बी ओ परिवार के आप जैसे सभी सदस्यों के स्नेह का ही परिणाम है कि मैं गजल लेखन में निरंतर सुधार कर पा रहा हूं । स्नेह बनाये रखें यही कामना है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 23, 2014 at 10:18am

आदरणीय भाई गिरिराज जी, की सराहना के लिए हार्दिक आभार । गजल पर आपकी उपस्थिति से निरंतर हौसला बढता है और खुशी होती है । अतः उपस्थिति बनाए रख मार्गदर्शन करते रहें । पुनः हार्दिक धन्यवाद ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 21, 2014 at 11:13pm

आदरणीय लक्ष्मण धामीजी,

सर्वप्रथम, आपकी ग़ज़ल में मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है कि आप इसकी प्रस्तुति के क्रम में धन्यवाद ज्ञापित करें. हमने तो बस इसके लिहाज पर नज़र डाली थी, बस !  आपकी ग़ज़ल इसी प्रारूप में थी. और क्या खूब ग़ज़ल हुई है ! 

बधाई स्वीकारें, आदरणीय. 

सादर

Comment by mrs manjari pandey on July 20, 2014 at 7:32pm
कोसते रावण को हर दिन, चल पड़े जो पथ उसी के
किस हवस ने कर दिया अब, आचरण कमजोर यारो
**
सोच लेना तुम मनुजता, है अभी जीवित जगत में
देख बेबस की दशा यदि नम हुई है कोर यारो
**

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी जितनी भी तारीफ़ की जाए काम है बेहतरीन हिंदी ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 19, 2014 at 9:01pm

रो रहा है जो ‘मुसाफिर’, भीड़ से  छुप के कहीं गर
सच थकन से तो नहीं पर, दुख से दुखता पोर यारो

सभी दुखी हैं रस्ते दिखाई नहीं पड़ते या हम पहचान नहीं पाते 

रास्ते पहचान पायें कब वो होगी भोर यारों ...सादर!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 17, 2014 at 2:54pm

सोच  लेना तुम मनुजता, है  अभी जीवित जगत में
देख   बेबस  की  दशा  यदि  नम  हुई  है  कोर यारो

बेहतरीन i बेहतरीन i बेहतरीन i साधुवाद धामी जी

Comment by Sushil Sarna on July 16, 2014 at 7:33pm

अब बुढ़ापा द्वार पर हर घर के बैठा है अकेला

खो गया है आँगनों से बचपनों का शोर यारो

निःशब्द हूँ आपकी इस खूबसूरत ग़ज़ल की प्रस्तुति पर .... कृपया हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय

कृपया ध्यान दे...

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