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साँसें जब करने लगीं, साँसों से संवाद

जुबाँ समझ पाई तभी, गर्म हवा का स्वाद

 

हँसी तुम्हारी, क्रीम सी, मलता हूँ दिन रात

अब क्या कर लेंगे भला, धूप, ठंढ, बरसात

 

आशिक सारे नीर से, कुछ पल देते साथ

पति साबुन जैसा, गले, किंतु न छोड़े हाथ

 

सिहरें, तपें, पसीजकर, मिल जाएँ जब गात

त्वचा त्वचा से तब कहे, अपने दिल की बात

 

छिटकी गोरे गाल से, जब गर्मी की धूप

सारा अम्बर जल उठा, सूरज ढूँढे कूप

 

प्रिंटर तेरे रूप का, मन का पृष्ठ सुधार

छाप रहा है रात दिन, प्यार, प्यार, बस प्यार

 

तपता तन छूकर उड़ीं, वर्षा बूँद अनेक

अजरज से सब देखते, भीगा सूरज एक

 

भीतर है कड़वा नशा, बाहर चमचम रूप

बोतल दारू की लगे, तेरा ही प्रारूप

-----------

(मौलिक एवम् अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 1, 2018 at 8:55pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय बृजेश जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 24, 2017 at 9:19pm
वाह आदरणीय सुन्दर सरस दोहे हुए..हार्दिक बधाई सादर
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 27, 2013 at 9:06pm

धन्यवाद Ketan Parmar जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 27, 2013 at 9:05pm

बहुत बहुत शुक्रिया  बृजेश नीरज जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 27, 2013 at 9:05pm

बहुत बहुत धन्यवाद Saurabh Pandey जी, स्नेह बना रहे

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 27, 2013 at 9:04pm

बहुत बहुत धन्यवाद  vandana tiwari जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 27, 2013 at 9:03pm

बहुत बहुत शुक्रिया जितेन्द्र 'गीत' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 27, 2013 at 9:03pm

बहुत बहुत धन्यवाद Shyam Narain Verma जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 27, 2013 at 9:02pm

बहुत बहुत शुक्रिया बसंत नेमा जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 27, 2013 at 9:02pm

बहुत बहुत धन्यवाद Laxman Prasad Ladiwala जी

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