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तेरी यादोँ के सिलसिले!

तुझे पाने की जुस्तजू मेँ
तेरा एहसास लिए,
रोज लड़ता हूं मैँ
तन्हाइयोँ से अपनी,
चाहत की रहगुजर पर,
अक्सर दे जाते हैँ
ग़म की सौगात,
और हवा मेरे जख्मोँ को,
कितने संगदिल हैँ
यह
तेरी यादोँ के सिलसिले!
(मौलिक व अप्रकाशित)
__आबिद अली मंसूरी

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Comment by Abid ali mansoori on June 6, 2013 at 2:42pm
हार्दिक धन्यवाद आदरणीय आशुतोष मिश्रा जी!
Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 6, 2013 at 2:21pm

सुंदर प्रस्तुति 

Comment by Abid ali mansoori on June 5, 2013 at 9:41pm
आदरणीय भाई संदीप जी हार्दिक आभार,आशा है आगे भी मार्गदर्शन करते रहेँगे,आपके स्नेह के लिए पुनःआभार!
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2013 at 9:33pm

बहुत सुन्दर वाह क्या बात है 

इस सुन्दर शब्द्संयोजन और भावों के लिए ह्रदय से बधाई स्वीकारें आदरणीय

Comment by Abid ali mansoori on June 5, 2013 at 10:51am
Aadarniye laxman ji bahut khushi huyee aapki tippani pakar,haardik abhaar aapka...
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 5, 2013 at 9:50am

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई श्री आबिद अली जी 

Comment by Abid ali mansoori on June 4, 2013 at 10:14pm
आदरणीया गीतिका 'वेदिका जी, बहुत-बहुत हार्दिक आभार इस दिली बधाई के लिए,आगे भी आपकी कीमती टिप्पणियोँ की अपेक्षा रहेगी,धन्यवाद!
Comment by वेदिका on June 4, 2013 at 9:26pm

सुंदर प्रयास जनाब आबिद अली जी! 
कितने संगदिल हैँ
यह

तेरी यादोँ के सिलसिले!
दिली शुभकामनाये  
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 4, 2013 at 7:57pm
"आदरणीय...आबिद साहब, आभार आपका "
Comment by Abid ali mansoori on June 4, 2013 at 6:48pm
Aadarniye ram shiromani ji hardik abhaar aapka..

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