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मैं तक़रीबन बीस साल बाद विदेश से अपने शहर लौटा था। बाज़ार में घूमते हुए सहसा मेरी नज़रें सब्ज़ी का ठेला लगाए एक वृद्ध पर जा टिकीं। बहुत कोशिश के बावजूद भी मैं उसको पहचान नहीं पा रहा था। लेकिन न जाने बार-बार ऐसा क्यों लग रहा था कि मैं उसे अच्छी तरह से जानता हूँ। मेरी उत्सुकता उससे भी छुपी न रही। उसके चेहरे पर आई अचानक मुस्कान से मैं समझ गया था कि उसने मुझे पहचान लिया था। काफ़ी देर की ज़हनी कशमकश के बाद जब मैंने उसे पहचाना तो मेरे पाँव के नीचे से मानो ज़मीन खिसक गई। जब मैं विदेश गया था तो इसकी एक बहुत बड़ी आटा मिल हुआ करती थी। नौकर-चाकर आगे-पीछे घूमा करते थे। धर्म-कर्म, दान-पुण्य में सबसे अग्रणी इस दानवीर पुरुष को मैं ताऊ जी कहकर बुलाया करता था। वही आटा मिल का मालिक और आज सब्ज़ी का ठेला लगाने पर मजबूर? 
मुझसे रहा नहीं गया और मैं उसके पास जा पहुँचा और बहुत मुश्किल से रुँधे गले से पूछा, “ताऊ जी, ये सब कैसे हो गया?”
भरी आँखें लिए मेरे कंधे पर हाथ रख रुँधे गले से उसने उत्तर दिया, “बच्चे बड़े हो गए हैं, बेटे।”

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 16, 2012 at 9:36pm

मैं पढ़ गया था. इस लघुकथा पर, जहाँ तक मुझे याद है, अपनी आपसी लम्बी टेलिफोनिक चर्चा भी हुई थी. लघुकथा के विन्यास पर भी हम देर तक चर्चा करते रहे थे.

लेकिन हम इस जगह पर अपनी टिप्पणी चस्पां नहीं कर पाये थे. आदरणीय योगराजभाई साहब, आज विनम्रता से आपकी इस प्रस्तुति पर अपने शब्द रख रहा हूँ ताकि सनद रहे.

Comment by MAHIMA SHREE on April 16, 2012 at 9:17pm
आदरणीय सर ,
सादर नमस्कार ,
अभी मैंने आपकी "संतान " पढ़ी . अंदर तक हिला दिया .सच जीवन की ये कैसी विडम्बना है , बच्चो के बड़े होते और माँ बाप के उम्र ढलते ही परस्थितिया बदल जाती है ..बेहद मर्मस्पर्शी और कटु सत्य / समय बदल जाता है पर हर काल में माँ बाप के साथ यही हाल होता है |
  
सच लघु होकर भी कथा कितनी गहरी बात कह जाती है ..
साधुवाद
 
Comment by डॉ. नमन दत्त on May 21, 2011 at 8:11am
क्या बात हैं योगराज जी...बेहद मार्मिक कटु सत्य को छुआ है आपने...साधुवाद स्वीकारें...
Comment by Bhasker Agrawal on December 5, 2010 at 8:27am
"बच्चे बड़े हो गए हैं बेटे !"...touching!
Comment by Lata R.Ojha on December 3, 2010 at 1:23pm
sach mein...aboojh hai ye jeewan ka khel...jinki ungli pakad ke chalna seekhte hain baad mein unka sahaara banna kyon bhool jaate hain log..
Comment by Dr. Umeshwar Shrivastava on November 22, 2010 at 9:22pm
योगी भाई ! कुछ दिनों पहले मैंने कवि-सम्मेलन में एक कविता सुनी थी-

‘पहले हम अपने माता-पिता के साथ रहते थे,
अब माता-पिता हमारे साथ रहते हैं।’

सुनकर बड़ी पीड़ा हुई थी। ‘‘बच्चे बड़े हो गए हैं बेटा’’ ने उस पीड़ा की याद पुनः दिला दी ।
Comment by Neelam Upadhyaya on November 22, 2010 at 11:27am
मात्र पाँच शब्दों में पूरी दुनियादारी समा गई । इसके लिए ' वाह !' लिए और कोई शब्द नही सूझ रहा । योगी जी को बहुत साधुवाद ।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 21, 2010 at 5:25pm
आदरणीय संपादक जी, आप OBO के लघु कथा विशेषज्ञ हो गये है, क्या बेहतरीन कहानी है, मैं जब इस लघु कथा को पढ़ रहा था तो अंतिम तक पढ़ते गया और सोचते गया कि अरे इस मे खास क्या है , कुछ लिखा ही नहीं और कहानी ख़त्म होने को है किन्तु ज्योही मैने यह पढ़ा कि "बच्चे बड़े हो गए हैं बेटे !" उछल पड़ा कि अरे पूरी लघु कथा तो बस इसी मे समाई है | वाकई जबरदस्त है | जितनी भी तारीफ़ किया जाय कम है | शिर्फ़ एक शब्द .....
अतुलनीय
Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on November 21, 2010 at 4:32pm
► योगी भईया ,,,
"बच्चे बड़े हो गए हैं बेटे !" इस एक वाक्य में सारा कलयुग समां गया है... लोग आपने भीतर को दर्शाने के लिए जाने कितना कुछ कह लेते हैं मगर कुछ बातें होती हैं जो एक वाक्य से भी दर्शायी जा सकती हैं..... पहले से जनता हूँ यह सब फिर भी नए सिरे से बुरा लगा.....
.
Comment by jogeshwar garg on November 21, 2010 at 1:32pm
युवाओं के लिए अवश्य पढ़ने लायक एक अति लघु कथा.

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