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हमने तो देखा बीज न खेतों में डालकर -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२


शीशा भी लाया आज वो लोहे में ढालकर
बोलो करोगे आप  क्या पत्थर उछाल कर।१।
*
जिन्दा ही दफ्न सत्य जो कल था किया गया
लानत समय  ने  आज  दी  मुर्दा  निकालकर।२।
*
वो बिक  गयी  है  वस्तु  सी  बेहाल भूख से
अब क्या रखोगे बोलिए उस को सँभालकर।३।
*
केवल किसान  जानता  मौसम की मार को
हम ने तो  देखा  बीज  न  खेतों  में डालकर।४।
*
रोटी का मोल  जानते  बचपन  से ही बहुत
माँ ने  खिलाया  खूब  है  पानी  उबालकर।५।
*
काँटों को रखता तेज है उनका स्वभाव ही
तीखे किये वो किसने भला छील छालकर।६।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 7, 2021 at 5:45am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति,

उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 7, 2021 at 5:44am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति व मार्गदर्शन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Samar kabeer on August 3, 2021 at 3:13pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'अब क्या रखोगे बोलिए उस को सँभालकर'

इस मिसरे में 'रखोगे' को "रखेंगे" करना उचित होगा ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 1, 2021 at 11:07pm

जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। मतले पर जनाब चेतन प्रकाश जी का इशारा कदाचित शुतरगुरबा दोष के भ्रम की तरफ़ है। यदि उचित लगे तो मतले का ऊला यूँ कर सकते हैं -

'शीशा भी लाए आज हम लोहे में ढालकर'   सानी में 'करोगे' को करेंगे करना उचित होगा।

तीसरे शे'र में' रखोगे' को 'रखेंगे' करना उचित होगा।  (कलाम की नफ़ासत और ज़बान की सलासत और शाईस्तगी के ऐतबार से)  सादर।

Comment by Chetan Prakash on August 1, 2021 at 12:46pm

ओ के, जनाब, मुसाफ़िर, आपकी ग़ज़ल आपकी नज़र, आदाब  ! 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 1, 2021 at 10:56am

आ. रचना बहन, सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति और स्नेह से मन हर्षित है । हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 1, 2021 at 10:50am

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन । मतले में दो अलग अलग व्यक्तियों को सम्बोधित किया गया है एक शीशे वाले को और दूसरा पत्थर मारने वाले को इस तथ्य पर गौर कीजिएगा , रब्त नजर आ जायेगी । सादर..

Comment by Rachna Bhatia on August 1, 2021 at 7:27am

आदरणीय लक्ष्मण धामी भाई नमस्कार। अच्छी ग़ज़ल हुई है। बधाई।

Comment by Chetan Prakash on August 1, 2021 at 7:12am

आदाब,, आदरणीय भाई,  लक्ष्मण सिंह मुसाफ़िर., शुभ प्रभात  ! मतले में रब्त न होने की वज़ह, मुझे इसलिए प्रतीत हुई कि ऊला 'वो' को समर्पित है, और, बंधु, 'आप' को  ! 'वो', तृतीय पुरुष,  एक वचन है, जब कि भाई, 'आप' द्वितीय पुरुष और एक वचन अथवा बहुवचन दोनों हो सकता है  !  मतला ऐसे लगता है, जैसे दोमुंहा सांप  ! सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 31, 2021 at 11:46pm

आ. भाई चेतन जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थित और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।

मतले में किस वजह से रब्त नजर नहीं आ रहा, बताने की क्रिपा करें जिससे सुधार किया जा सके । क्योंकि मेरे हिसाब से तो सब ठीक है ।

बाँकी पानी को उबालकर खिलाना इसलिए लिखा है क्योंकि निर्धन माँ फाके की स्थिति में अबोध बच्चों को पानी उबालकर ही भात पकने की झूठी तसल्ली दे देकर कई बार सुला देती है । यदि आपको अटपटा लग रहा हो तो खू है के स्थान पर "भात सा" पढ़ सकते हैं 

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