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ख़ामोश दो किनारे ....

ख़ामोश दो किनारे ....

बरसों के बाद
हम मिले भी तो किसी अजनबी की तरह
हमारे बीच का मौन
जैसे किसी अपराधबोध से ग्रसित
रिश्ते का प्रतिनिधित्व कर रहा हो

ख़ामोशी के एक किनारे पर तुम
सिर को झुकाये खड़ी हो
और
दूसरे किनारे पर मैं
मौन का वरण किये खड़ा हूँ

क्या कभी मिट पाएँगे
हम दोनों के मिलन में अवरोधक
ख़ामोशी के
ख़ामोश दो किनारे

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 578

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Comment by Sushil Sarna on November 6, 2020 at 9:12pm
आदरणीय    बृजेश कुमार 'ब्रज'  जी, सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का आभारी है।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2020 at 8:29pm

जबरजस्त भावों को समेटे हुए...बेहतरीन कविता आदरणीय ।

Comment by Sushil Sarna on October 21, 2020 at 6:23pm

आदरणीय  Samar kabeer  जी, आदाब, सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है

Comment by Samar kabeer on October 20, 2020 at 8:09pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on October 19, 2020 at 11:51am
आदरणीय अमीरुद्दीन जी, आदाब, सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 19, 2020 at 11:05am

बहुत ख़ूब आदरणीय जनाब सुशील सरना जी शानदार जज़्बात निगारी हुई है दिली मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।

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