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पागल दिल का पागल सपना ......

पागल दिल का पागल सपना ......

इत् -उत् ढूँढूँ साजन अपना
नैनन द्वार भी आये न सपना
बैरी कजरा बह -बह जाए
का से कहूँ दुःख साजन अपना
तुम यथार्थ से बन गए सपना

प्यार किया करके बिसराया
प्रीतम तोहे तरस न आया
तडपत तडपत रैन बिताई
काहे तो पे ये मन आया
मुश्किल दिल को है समझाना

भूलूँ कैसे तेरी बातें
प्यार भरी वो प्यारी रातें
हर आहट पर ऐसा लगता
लौटी जैसे फिर मुलाकातें
आहत करे तेरा यूँ जाना

साँसों में हैं तेरे तराने
जग जाने अपने अफ़साने
लौट के आजा साजन मोरे
पड़ें न जलते दीप बुझानें
हुआ कठिन तुझको बिसराना

पागल दिल का पागल सपना
इत् -उत् ढूँढे साजन अपना
बैरी कजरा बह बह जाए
का से कहूँ दुःख साजन अपना
कैसे पूरा होगा आखिर
पागल दिल का पागल सपना

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 16, 2020 at 8:11pm

आदरणीय  Samar kabeer  जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Samar kabeer on October 15, 2020 at 3:46pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

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