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ग़ज़ल नूर की -वो कहता है मेरे दिल का कोना कोना देख लिया

वो कहता है मेरे दिल का कोना कोना देख लिया
तो क्या उस ने तेरी यादों वाला कमरा देख लिया?
.
वैसे उस इक पल में भी हम अपनों ही की भीड़ में थे
जिस पल दिल के आईने में ख़ुद को तन्हा देख लिया.
.
उस के जैसा दिल तो फिर से मिलता हम को और कहाँ
सो हमने इक राह निकाली, मिलता जुलता देख लिया.
.
मैख़ाने में एक शराबी अश्क मिलाकर पीता है
यादों की आँधी ने शायद उसे अकेला देख लिया.
.
महशर पर हम उठ आए उस की महफ़िल से ये कहकर
तेरी दुनिया तुझे मुबारक़! तेरा होना देख लिया.
.
बिकने पे आए थे हम भी, शुक्र मनाओ बिक न सके
बोली जिस जिस ने भी लगाई, हम से सस्ता देख लिया.
.
“नूर” इस दुनिया से जाने की तेरी बेला आन पड़ी
तूने वैसे भी जो कुछ था देखने जैसा देख लिया.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 28, 2020 at 4:55pm

शुक्रिया आ. समर सर, शुक्रिया आ. मनोज भाई 

Comment by मनोज अहसास on September 28, 2020 at 4:05pm

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है आदरणीय नूर साहब 

आपके और आदरणीय समर साहब के विचार विमर्श को पढ़ रहा था मेरा निवेदन है कि "यादों का कमरा" वाला ख़्याल ज्यादा मजबूत है उसे ही सही करके रखा जाए

बाकी  ग़ज़ल बेहतरीन है ही

सादर

Comment by Samar kabeer on September 28, 2020 at 3:52pm

'यानी समुन्दर के धोखे में कोई क़तरा देख लिया'

मेरे ख़याल में 'कोई' की जगह "उसने" शब्द उचित होगा । 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 28, 2020 at 3:22pm

आ. समर सर एवं मंच के सुधि पाठक गण!
.
मतले में बहुत विचार के बाद तरमीम की है ..
अब मतला यूँ पढ़ा जाए..
.
वो कहता है मेरे दिल का कोना कोना देख लिया
यानी समुन्दर के धोखे में कोई क़तरा देख लिया.
.
साथ ही सुझाव भी दें कि अब यह कैसा लग रहा है.
सादर 

Comment by Sushil Sarna on September 20, 2020 at 9:30pm
आदरणीय बहुत सुंदर प्रस्तुति हार्दिक बधाई
Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 16, 2020 at 2:42pm

आ. समर सर ,
पुन: विचार करता हूँ..
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 16, 2020 at 2:41pm

शुक्रिया आ. लक्ष्मण जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 16, 2020 at 2:41pm

शुक्रिया आ. सालिक गणवीर साहब 

Comment by Samar kabeer on September 15, 2020 at 8:45pm

उचित लगे तो मतले का सानी यूँ कर सकते हैं:-

'तो क्या उसने तेरी यादों का भी कमरा देख लिया'

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 15, 2020 at 8:32pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन । इस बेहतरीन गजल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

कृपया ध्यान दे...

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