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ग़ज़ल नूर की- तू ये कर और वो कर बोलता है.

तू ये कर और वो कर बोलता है.
न जाने कौन अन्दर बोलता है
.
मेरे दुश्मन में कितनी ख़ामियाँ हैं
मगर मुझ से वो बेहतर बोलता है.
.
जुबां दिल की; मेरे दिल से गुज़रकर
मेरे दुश्मन का ख़ंजर बोलता है.
.
मैं कट जाऊं मगर झुकने न देना
मेरे शानों धरा सर बोलता है.
.
मैं हारा हर लड़ाई जीत कर भी
जहां सुन ले! सिकंदर बोलता है.
.
बहुत भारी पडूँगा अब कि तुम पर
अकेलों से दिसम्बर बोलता है.
.
नया मज़हब नई दुनिया बनाओ
ये जुमला हर पयम्बर बोलता है.
.
तेरे अन्दर के नंगेपन को शाइर  
शराफ़त में दिगम्बर बोलता है.
.
ये तारीफ़ें जो ज़ालिम की करो हौ
ज़ुबां कट जाने का डर बोलता है.   
.

निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 871

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 10, 2019 at 11:35am

शुक्रिया आ. समर सर,
आपके कहे अनुसार ज़बां का टाइपो एरर मूल प्रति में दुरुस्त क्र लिया है. 
मेरे शानों धरा वाले शेर के ऊला में थोडा जम का अहसास भी था सो उसे अभी निकाल दिया है..
सिकंदर पर काम जारी है ..
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 10, 2019 at 11:33am

शुक्रिया आ. लक्ष्मण जी 

Comment by Samar kabeer on December 8, 2019 at 2:34pm

जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'जुबां दिल की; मेरे दिल से गुज़रकर'

इस मिसरे में 'जुबां' को "ज़बाँ" कर लें ।

'मेरे शानों धरा सर बोलता है'

इस मिसरे में वाक्य विन्यास ठठीक नहीं,देखियेगा । 

'जहां सुन ले! सिकंदर बोलता है'

इस मिसरे में बहतरी की गुंजाइश है,देखियेगा ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 7, 2019 at 11:05am

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन। बहुत ही उम्दा गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 7, 2019 at 9:38am

शुक्रिया आ. सुरेन्द्र भाई 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 7, 2019 at 9:38am

शुक्रिया आ. सलीम रज़ा साहब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 7, 2019 at 9:38am

शुक्रीआ आ. प्रदीप जी 

Comment by नाथ सोनांचली on December 3, 2019 at 7:30pm

आद0 नीलेश भाई जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कहीं आपने। बहुत दिन बाद आपकी ग़ज़ल से मुखातिब भी हो रहा हूँ। शेर दर शैर बधाई स्वीकार कीजिए

Comment by SALIM RAZA REWA on December 3, 2019 at 6:51pm

भाई नीलेश जी (करो हौ ) का ज़बाब नहीं। खूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on December 2, 2019 at 6:37pm

बहुत खूब निलेश जी, गज़ल में से अच्छा खासा नूर टपक रहा है 

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