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1212 - 1122 - 1212 - (112 / 22) 

किसी की याद में ख़ुद को भुला के देखते हैं

निशान ज़ख्मों  के हम  मुस्कुरा के देखते हैं 

 

निकल तो आए हैं तूफ़ाँ की ज़द से दूर बहुत 

भँवर हैं कितने ही  जो सर उठा के देखते हैं 

चले भी आओ कि अब  इंतज़ार  होता नहीं 

कि अब ये रस्ते हमें  मुँह चिढ़ा के  देखते हैं  

ये ज़िन्दगी भी फ़ना कर दी हमने जिनके लिए 

वही  तो  हैं  जो   हमें  आज़मा के  देखते  हैं 

 

तेरी जफ़ा  के  निशाँ  सब  मिटा  दिए हमने

दिवार  नफ़रतों  की  फिर गिरा के देखते  हैं 

दबी हुई  थी जो  चिंगारी  उसको  देके  हवा 

रुमूज़-ए-इश्क़  से  पर्दा  उठा  के  देखते  हैं 

पड़ी  है  धूल  जो  बरसों  से  इस  दरीचे  में 

नुक़ूश  होंगे  वफ़ा  के   हटा  के   देखते   हैं 

जमी है बर्फ़ जो रिश्तों  के दरमियाँ कब  से

ज़रा  सी  धूप उसे भी  दिखा  के  देखते  हैं 

बचे   रहेंगे    बनेंगे    या    राख    आतिश   में 

'अमीर' अब इश्क़ में ख़ुद को जला के देखते हैं 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on April 11, 2021 at 6:24pm

जनाब बृजेश कुमार ब्रज जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया।  सादर।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 8, 2021 at 5:05pm

बहुत खूब ग़ज़ल कही आदरणीय हार्दिक बधाई...

Comment by Chetan Prakash on April 6, 2021 at 10:53am

 आदाब, अमीर साहब, आप ठीक कह रहे हैं, अलिफ वस्ल दोहरा है! आभार! 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on April 6, 2021 at 9:29am

//कृपया, मकते की बह्र "'अमीर' अब इश्क़ में ख़ुद को जला के देखते हैं," देखें !//

जनाब चेतन प्रकाश जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और ज़र्रा नवाज़ी का शुक्रिया।

1 2  1  2    - 1  1  2   2  - 1  2 1  2 - 1 1 2  

अमी र बिश् - क़ में ख़ुद को - जला के दे- ख ते हैं

(अलिफ़ वस्ल) 

'अमीर' अब इश्क़ में ख़ुद को जला के देखते हैं'। दो शब्द कहें आदरणीय चेतन प्रकाश जी।  सादर। 

Comment by Chetan Prakash on April 6, 2021 at 6:31am

आदाब, कृपया, मकते की बह्र "'अमीर' अब इश्क़ में ख़ुद को जला के देखते हैं," देखें !

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on April 4, 2021 at 4:47pm

जनाब आज़ी तमाम साहिब आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के लिये आपका तहे-दिल से शुक्रिया। सादर।

Comment by Aazi Tamaam on April 4, 2021 at 12:16am

सादर प्रणाम आदरणीय अमीर जी

ये ज़िंदगी फ़ना कर दी..... बेहद पसंद आया 

सुंदर ग़ज़ल से रू ब रू कराने के लिये आभार

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 28, 2020 at 8:07pm

आदरणीय Harash Mahajan साहिब आदाब, जनाब ग़ज़ल पर आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल से शुक्रिया। सादर।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 28, 2020 at 8:04pm

जनाब रूपम कुमार जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के लिये आपका तहे-दिल से शुक्रिया। सादर।

Comment by Harash Mahajan on August 27, 2020 at 8:38pm

वाह आदरणीय बहुत ही सुंदर शेरों से पेश की गई ग़ज़ल । दिली मुबारकबाद।

कृपया ध्यान दे...

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