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पनघट के दोहे- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

पनघट पोखर बावड़ी, बरगद पीपल पेड़
उनकी बातें कर न अब, बूढ़े मन को छेड़।१।
**
जिस पनघट व्याकुल कभी, बैठे थे हर शाम
पुस्तक में ही शेष अब, लगता उस का नाम।२।
**
पनघट सारे खा गया, सुविधाओं का खेल
फिर भी सुख से हो सका, नहीं हमारा मेल।३।
**
पीपल देखे गाँव का, बीते कितने साल
कैसा होगा क्या पता, अब पनघट का हाल।४।
**
पथिक ढूँढ नव राह तू, अगर बुझानी प्यास
पनघट ही जब ना रहे, क्या गोरी की आस।५।
**
सब मिल पनघट थीं कभी, बतियाती चित खोल
घर- घर नल से छिन गये, सुख के पल अनमोल।६।
**
अब भी कितने गाँव में, पसरी प्यास अथाह
पनघट की कहते तभी, बहुत कठिन है राह।७।
**
ऐसे कितने गाँव हैं, अब भी यूँ सरकार
कोसों नंगे पाँव चल, पनघट जाती नार।८।
**
नल ने घट जब से भरा, पनघट का पथ बन्द
पोखर नदिया बावड़ी, दिखता केवल गन्द।९।
**
तन - मन की बुझती रही, कैसे कैसे प्यास
कहता पनघट खो गया, लेकर यह इतिहास।१०।


**
मौलिक.अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 19, 2020 at 9:46am

आ. भाई सुरेन्द्र नाथ जी, सादर अभिवादन । आपको दोहे अच्छे लगे यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 19, 2020 at 9:45am

आ. भाई सालिक जी, सादर अभिवादन । आपको दोहे अच्छे लगे यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 19, 2020 at 9:44am

आ. भाई बसंत कुमार जी, सादर अभिवादन । दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 19, 2020 at 9:42am

आ. भाई रूपम जी, गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार ।

ओबीओ परिवार में सीखने सिखाने की अद्भुत परम्परा कायम है । मैंने भी विद्वजनों के सानिन्ध्य में लेखनी को निरंतर प्रयास किया है । विद्वजनों के सुझावों के उजाले में आप भी ओबीओ परिवार को उत्तम रचनाओं का उपहार देंगे,  यही कामना है । सादर...

Comment by नाथ सोनांचली on July 18, 2020 at 4:40pm

आद0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी सादर अभिवादन। अच्छे दोहे सृजित हुए हैं।बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by सालिक गणवीर on July 18, 2020 at 9:27am

भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

सादर अभिवादन

पनघट पर इतने मनभावन दोहे लिखने के लिए हार्दिक शुभकामनाएँँ स्वीकार करें. सादर.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 18, 2020 at 9:18am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । आपको दोहे अच्छे लगे यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 18, 2020 at 9:17am

आ. भाई विजय शंकर जी, सादर अभिवादन । दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवरधन के लिए आभार।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 17, 2020 at 9:40pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार

आनन्द आ गया दोहे पढकर 

शानदार निर्वाह पनघट का 

बधाई आपको 

Comment by TEJ VEER SINGH on July 17, 2020 at 11:31am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बेहतरीन दोहे।

पीपल देखे गाँव का, बीते कितने साल
कैसा होगा क्या पता, अब पनघट का हाल।४।

ऐसे कितने गाँव हैं, अब भी यूँ सरकार
कोसों नंगे पाँव चल, पनघट जाती नार।८।

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