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उसने बस धन देखा है,
कब ये जीवन देखा है ।
टेसू छाया बाग़ों में,
उसका यौवन देखा है ।
देखी उसकी सूरत तो,
फिर से दरपन देखा है ।
जब-जब बरसे बादल तो,
भीगा तन-मन देखा है ।
उसकी बजती पायल पर,
खिल उठता मन देखा है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on May 24, 2017 at 7:03pm
बहुत-बहुत आभार आदरणीय अनुराग वशिष्ठ जी ।
Comment by Mohammed Arif on May 22, 2017 at 6:51pm
ग़ज़ल की सराहना के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी । लेखन सार्थक हुआ ।
Comment by Mohammed Arif on May 22, 2017 at 6:50pm
ग़ज़ल की सराहना और हौसला अफज़ाई का बहुत-बहुत शुक्रिया आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ।
Comment by Mohammed Arif on May 22, 2017 at 6:48pm
बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय सुरेंद्र नाथ जी । लेखन सार्थक हुआ ।
Comment by narendrasinh chauhan on May 22, 2017 at 6:29pm

खुब  सुन्दर रचना 

Comment by नाथ सोनांचली on May 22, 2017 at 3:09pm
आद0 मोहम्मद आरिफ़ साहिब सादर अभिवादन, बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । सादर
Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 3:03pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on May 22, 2017 at 10:42am
बहुत-बहुत आभार आदरणीय नीलेश जी ।
Comment by Mohammed Arif on May 22, 2017 at 10:41am
बहुत-बहुत आभार आदरणीय गुरप्रीत जी ।
Comment by Gurpreet Singh jammu on May 21, 2017 at 8:39pm
बहुत अच्छे शैर कहे हैं आपने इस ग़ज़ल में आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी ...बहुत बधाई आपको

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