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छंद मुक्त कविता : रावण दहन

छंद मुक्त कविता : रावण दहन

मैं रूप बदल कर बैठा हूँ ।
स्वरूप बदल कर बैठा हूँ ।
मैं आज का रावण हूँ मितरों,
जन के मन में छुप बैठा हूँ ।।

मुझको जितना भी जलाओगे ।
हर घर में उतना पाओगे ।
गर मरना भी चाहूँ मितरों,
तुम राम कहाँ से लाओगे ।।

कन्या को देवी सा मान दिया ।
नारी को माँ का सम्मान दिया ।
इन बातों का नही अर्थ मितरों,
जब गर्भ में कन्या का प्राण लिया ।। 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 16, 2019 at 7:29pm

आ. भाई गणेश जी , बेहतरीन रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2019 at 10:10am

अच्छी शिक्षाप्रद कविता आदरणीय..हार्दिक बधाई

Comment by Samar kabeer on October 11, 2019 at 7:11pm

जनाब गणेश जी 'बाग़ी' साहिब आदाब,बहुत उम्द: और सटीक तंज़ किये हैं आपने इस कविता के माध्यम से,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 11, 2019 at 11:14am

हार्दिक बधाई आदरणीय गणेश जी बागी जी। बेहतरीन प्रस्तुति।

Comment by Sushil Sarna on October 10, 2019 at 5:13pm

आदरणीय गणेश जी बागी साहिब, आदाब .... सर बहुत सुंदर और सार्थक सृजन हुआ है। इस पेशकश के लिए दिल से बधाई।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2019 at 4:57pm

आदाब। समसामयिक परिदृश्य, आकांक्षाओं, कामनाओं, आग्रह और आह्वानों को समेटती बेहतरीन छंदमुक्त चतुष्पदियों हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय श्री गणेशजी बागी साहिब। विजयादशमी पर्व पर हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं।

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