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ग़ज़ल-किनारा हूँ तेरा तू इक नदी है

अरकान-1222  1222  122

किनारा हूँ तेरा तू इक नदी है
बसी तुझ में ही मेरी ज़िंदगी है।।

हमारे गाँव की यह बानगी है
पड़ोसी मुर्तुज़ा का राम जी है।।

ख़यालों का अजब है हाल यारो
गमों के साथ ही रहती ख़ुशी है।।

घटा गम की डराए तो न डरना
अँधेरे में ही दिखती चाँदनी है।।

मुकम्मल कौन है दुनिया में यारो
यहाँ हर शख़्स में कोई कमी है।।

बनाता है महल वो दूसरों का
मगर खुद की टपकती झोपड़ी है।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Ajay Tiwari on July 20, 2019 at 11:06am

आदरणीय सुरेन्द्र जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

Comment by नाथ सोनांचली on February 15, 2019 at 8:59pm

आद0 सतविंद्र कुमार राणा जी सादर अभिवादन। बहुत बहुत आभार आपका

Comment by नाथ सोनांचली on February 15, 2019 at 8:58pm

आद0 दिगंबर नासवा जी सादर अभिवादन। आभार आपका

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 12, 2019 at 7:35pm

बेहतरीन अशआर! हारदुक बधाई

Comment by दिगंबर नासवा on February 8, 2019 at 1:25pm

खूबसूरत सादा ग़ज़ल ...

दिल को छूते हुए अलफ़ाज़ ... मेरी दाद कबूल कें ...

Comment by नाथ सोनांचली on February 5, 2019 at 5:37pm

आद0 आसिफ जैदी साहब सादर अभिवादन। ग़ज़ल पर आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया के लिए हृदय तल से आभार। 

Comment by नाथ सोनांचली on February 5, 2019 at 5:36pm

आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम। ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और मनोहारी प्रतिक्रिया के लिए हृदय तल से आभार। सब आपकी ही देन है अग्रज श्री। 

Comment by Asif zaidi on February 5, 2019 at 5:29pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'  साहब बहुत शानदार ग़ज़ल की मुबारकबाद क़़ुबूूल करें सादर

Comment by Samar kabeer on February 4, 2019 at 9:24pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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