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वोट देकर मालिकाना हक गँवाया- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२१२२/२१२२/२१२२/२१२


दीप की लौ से निकलती रौशनी भी देख ली 
और उस की छाँव  बैठी  तीरगी भी देख ली।१।
*
वोट देकर मालिकाना हक गँवाया हमने यूँ
चार दिन में  सेवकाई  आपकी भी देख ली।२।
*
दुश्मनी का रंग हम ने जन्म से देखा ही था
आज संकट के समय में दोस्ती भी देख ली।३।
*
आ न पाये होश में क्यों आमजन से दोस्तो
दे के उस ने तो  हमें  संजीवनी भी देख ली।४।
*
खूब उम्मीदें जतायी नित सियासत ने मगर
भूखी प्यासी छटपटाती ये सदी भी देख ली।५।
*
मिट न पायी है पिपासा आजतक कोई नहीं
चाँद मंगल  की  जगत  ने  देहरी भी देख ली।६।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 16, 2021 at 6:35pm

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 16, 2021 at 3:56pm

बहुत ही खूब ग़ज़ल कही आदरणीय...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2021 at 12:55pm

आ. रचना बहन। सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार ।

Comment by Rachna Bhatia on March 11, 2021 at 11:44am

आदरणीय लक्ष्मण धामी'मुसाफ़िर'भाई नमस्कार। अच्छी ग़ज़ल हुई। हार्दिक बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2021 at 4:16pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार ।

Comment by सालिक गणवीर on March 8, 2021 at 6:26pm

भाई  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी
सादर अभिवादन
एक और बहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाइयाँ स्वीकार करें

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2021 at 1:53pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2021 at 1:51pm

आ. भाई क्रिस मिश्रा जी, गजल पर उपस्थिति व प्रशंसा के लिए धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2021 at 1:50pm

आ. भाई समर जी सादर अभिवादन । पुनः उपस्थिति और बेहतरीन सलाह के लिए आभार।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2021 at 12:41am

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है आदरणीय भैया हार्दिक बधाई।

सदी वाला शेर बहुत पसंद आया।

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