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झूठी बातें कह कर दिनभर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२


झूठी बातें कह कर दिनभर जब झूठे इठलाते हैं
हम सच के झण्डावरदारी क्यों इतना शर्माते हैं।१।
***
अफवाहों के जंगल यारो सभ्य नगर तक फैल गये
क्या होगा अब विश्वासों  का  सोच सभी घबराते हैं।२।
***
कैसे सूरज चाँद सितारे  अब तक चुनते आये हम
बात उजाले की कर के  जो  नित्य  अँधेरा लाते हैं।३।
***
नित्य हादसे  होते  हैं  या  उन में  साजिश होती है
छोटा सा ये राज भला क्यों समझ नहीं हम पाते हैं।४।
***
नित्य बदल तारीखों जैसे लोग यहाँ पर खूब रहे
एक हमीं है जैसा  चेहरा   वैसा  ही दिखलाते हैं।५।
***
राजनीति ने रीत यहाँ की बदली है बेहूदेपन तक
सीख हमीं से कौशल बच्चे हमको ही समझाते हैं।६।
***
कोशिश तो बेढब  होती  है  सागर पार उतरने की
बेबस होके फिर साहिल पर लौट मुसाफिर आते है।७।
***
मौलिक.अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2020 at 12:28pm

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by Samar kabeer on February 23, 2020 at 11:37am

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2020 at 2:55pm

आ. भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए आभार ।

Comment by vijay nikore on February 21, 2020 at 11:57am

बहुत ही उम्दा गज़ल कही है। बधाई, मित्र लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 20, 2020 at 11:29am

आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on February 20, 2020 at 8:51am

आदरणीय लक्ष्मण भाई, आदाब। बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है, शेर दर शेर दाद और मुबारक़बाद क़ुबूल करें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2020 at 11:59am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार..

Comment by TEJ VEER SINGH on February 18, 2020 at 1:42pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी।बेहतरीन गज़ल।

राजनीति ने रीत यहाँ की बदली है बेहूदेपन तक
सीख हमीं से कौशल बच्चे हमको ही समझाते हैं।६।

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