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धरणी भी आखिर रोती है

कितने ही द्रव्य और निधियाँ,
वह अपने गर्भ संजोती है
पर पल में मानव नष्ट करे
धरणी भी आख़िर रोती है

काटे नित हरे वृक्ष , पर्वत
माँ की काया श्री हीन करे
अपनी ही विपुल संपदा को
वह काँप-काँप कर खोती है
धरणी भी आख़िर रोती है

उसके ही सीने पर चढ़कर
जो भव्य इमारत खड़ी हुईं
उन बोझों से दबकर,थककर
अपनी कराह को ढोती है
धरणी भी आख़िर रोती है

उद्योग और कारखाने 
हैं कचरा नदियों में डालें
इनमें घुल गए रसायन में
मारक क्षमता तो होती है
धरणी भी आख़िर रोती है

हैं धुआँ उगलते सड़कों पर
भारी वाहन , मोटरगाड़ी
वायु भी तो ज़हरीली,भर
सीने में , डंक चुभोती है
धरणी भी आख़िर रोती है

जिससे आती अति वृष्टि,बाढ़
हो अनावृष्टि पड़ता अकाल
अपना भविष्य खुद नष्ट करें
क्षण में सब प्रकृति डुबोती है
धरणी भी आख़िर रोती है

भू की छाती , स्पर्धावश
एटमी परीक्षण हों जब-तब
बढ़ती रेडियोधर्मिता से
ओजोन परत को खोती है
धरणी भी आख़िर रोती है

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Usha Awasthi on February 25, 2020 at 11:40am

हार्दिक धन्यवाद आपका

Comment by vijay nikore on February 25, 2020 at 10:39am

रचना अच्छी लगी। हार्दिक बधाई, मित्र ऊषा जी।

Comment by Usha Awasthi on February 18, 2020 at 12:20pm

बहुत-बहुत धन्यवाद

Comment by Usha Awasthi on February 18, 2020 at 12:18pm

आदाब, हार्दिक आभार आपका

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 17, 2020 at 3:42pm

आ. ऊषा जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on February 16, 2020 at 8:35pm

मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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