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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – August 2014 Archive (7)

राह देखी सूर्य की भर रात हमने - ( गजल ) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

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सिंधु  मथते  कर पड़ा  छाला हमारे

हाथ  आया  विष  भरा प्याला हमारे

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धूर्तता  अपनी  छिपाने  के लिए क्यों

देवताओं    दोष    मढ़   डाला  हमारे

***

भाग्य सुख को ले चला जाने कहाँ फिर

डाल  कर  यूँ  द्वार  पर  ताला  हमारे

***

हर  तरफ  फैले हुए हैं दुख के बंजर

खेत  सुख  के  पड़ गया पाला हमारे

***

राह  देखी  सूर्य  की  भर   रात हमने

इसलिए  तन  पर  लगा काला…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 27, 2014 at 11:14am — 10 Comments

अदाओं से उसका लुभाना गया - ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

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नीर पनघट  से  भरना, बहाना गया

चाहतों का वो दिलकश जमाना गया

***

दूरियाँ  तो  पटी  यार  तकनीक  से

पर अदाओं से उसका लुभाना गया

***

पेड़  आँगन  से  जब  दूर  होते गये

सावनों  का  वो मौसम सुहाना गया

***

आ  गये  क्यों  लटों  को बिखेरे हुए

आँसुओं  का  हमारे  ठिकाना  गया

***

नाम  उससे  हमारा  गली  गाँव  में

साथ  जिसके हमारा  जमाना  गया

***

गंद शहरी जो गिरने…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2014 at 10:00am — 25 Comments

बेगानों की महफिल में तो - ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

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देता  है  आवाजें  रूक-रूक  क्यों मेरी खामोशी को

थोड़ा तो मौका दे मुझको गम से हम आगोशी को

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कब  मागे  मयखाने  साकी  अधरों ने उपहारों में

नयनों के दो प्याले काफी जीवन भर मदहोशी को

***

देखेगी  तो  कर  देगी  फिर  बदनामी  वो तारों तक

अपना आँचल रख दे मुख पर दुनियाँ से रूपोशी को

***

बेगानों  की  महफिल  में  तो चुप रहना मजबूरी थी

अपनों  की  महफिल  में  कैसे अपना लूँ बेहोशी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 20, 2014 at 11:21am — 24 Comments

ये मिट्टी भी हमारी ही महक देती खलाओं तक - ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

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जहन  की  हर  उदासी  से  उबरते तो सही पहले

जरा तुम नेह के पथ से गुजरते  तो सहीे पहले

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हमारी  चाहतों  की  माप  लेते  खुद ही गहराई

जिगर  की  खोह में थोड़ा उतरते तो सही पहले

**

ये मिट्टी भी हमारी ही महक देती खलाओं तक

हमारे  नाम  पर  थोड़ा  सॅवरते तो सही पहले

**

तुम्हें भी धूप सूरज की बहुत मिलती दुआओं सी

घरों  से  आँगनों  में  तुम  उतरते तो सही पहले

**

गलत फहमी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 17, 2014 at 9:30am — 18 Comments

बोलने से कौन करता है मना - (ग़ज़ल) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

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जन्म  से  ही   यार  जो  बेशर्म  है

पाप क्या उसके लिए, क्या धर्म है

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छेड़ मत तू बात किस्मत की यहाँ

साथ  मेरे  शेष  अब  तो  कर्म  है

**

बोलने  से  कौन  करता है मना

सोच पर ये शब्द का क्या मर्म है

**

चाँद  आये  तो  बिछाऊँ  मैं उसे

 एक  चादर  आँसुओं  की नर्म है

**

शीत का मौसम सुना है आ गया

पर चमन की  ये हवा क्यों गर्म है

**

( रचना - 30 जुलाई 2014 )



मौलिक…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 11, 2014 at 11:00am — 15 Comments

घर जलाना भी हमारा व्यर्थ अब - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

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मयकदे को अब शिवाले बिक गये

रहजनों  के  हाथ  ताले बिक गये

**

घर  जलाना भी  हमारा व्यर्थ अब

रात  के  हाथों  उजाले  बिक  गये

**

जो खबर थी अनछपी ही रह गयी

चुटकले  बनकर मशाले बिक गये

**

न्याय फिर बैसाखियों पर आ गया

जांच  के  जब  यार आले बिक गये

**

दुश्मनों की अब जरूरत क्या रही

दोस्ती के फिर से पाले बिक गये

**

सोचते  थे नींव जिनको गाँव की

वो शहर में बनके माले बिक गये

**



मौलिक और…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 8, 2014 at 10:39am — 15 Comments

‘रेप’ को जोकर सरीखों ने कहा जब बचपना - ग़ज़ल

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एक   सरकस   सी   हमारी   आज  संसद  हो गयी

लोक हित की इक नदी जम आज हिमनद हो गयी

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जुगनुओं से  खो  गये  लीडर  न  जाने फिर कहाँ

मसखरों  की आज  इसमें  खूब  आमद  हो गयी

**

‘रेप’ को  जोकर  सरीखों ने  कहा  जब  बचपना

जुल्म  की  जननी खुशी से  और गदगद हो गयी

**

दे  रहे  ऐसे  बयाँ,  जो   जुल्म   की   तारीफ  है

क्योंकि  सुर्खी  लीडरों का आज मकसद हो गयी

**

जुल्म  की  सरहद…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 3, 2014 at 9:00am — 26 Comments

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