For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मौत खुशियों की कहाँ पर टल रही है-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२
**
आग में जिसके ये दुनिया जल रही है
वह सियासत कब तनिक निश्छल रही है।१।
*
पा लिया है लाख तकनीकों को लेकिन
और आदम युग में दुनिया ढल रही है।२।
*
क्लोन का साधन दिया विज्ञान ने पर
मौत खुशियों की कहाँ पर टल रही है।३।
*
मान मर्यादा मिटाकर पाप करती
(भूल जाती मान मर्यादा सदा वह)
भूख दौलत की जहाँ भी पल रही है।४।
*
गढ़ लिए मजहब नये कह बद पुरानी
पर न सीरत एक की उज्वल रही है।५।
*
दौड़ती नफरत हमेशा फिर रही जब
प्रीत क्यो अभिशाप सी निश्चल रही है।६।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Views: 224

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 13, 2025 at 3:06pm

जय हो.. 

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2025 at 5:04pm

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थित और मार्गदर्शन के लिए आभार। कुछ सुधार किया है देखिएगा।

आग में जिसकी ये दुनिया जल रही है
वह सियासत भी कभी निश्छल रही है।१।
*
लाख तकनीकें नयी अपनायी जग ने
फिर भी आदिम युग में दुनिया ढल रही है।२।
*
क्लोन का साधन दिया विज्ञान ने पर
मौत खुशियों की कहाँ पर टल रही है।३।
*
भूल जाती मान मर्यादा सदा वह
भूख दौलत की जहाँ भी पल रही है।४।
*
धर्म नूतन तो रचे बदलाव कहकर
किन्तु सीरत कौन सी उज्वल रही है।५।
*
दौड़ती नफरत सदा हर ओर है तब
प्रीत क्यों अभिशप्त सी निश्चल रही है।६।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2025 at 5:03pm

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2025 at 5:02pm

आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2025 at 5:01pm

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2025 at 5:00pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थित और मार्गदर्शन के लिए आभार। कुछ सुधार किया है देखिएगा।

आग में जिसकी ये दुनिया जल रही है
वह सियासत भी कभी निश्छल रही है।१।
*
लाख तकनीकें नयी अपनायी जग ने
फिर भी आदिम युग में दुनिया ढल रही है।२।
*
क्लोन का साधन दिया विज्ञान ने पर
मौत खुशियों की कहाँ पर टल रही है।३।
*
भूल जाती मान मर्यादा सदा वह
भूख दौलत की जहाँ भी पल रही है।४।
*
धर्म नूतन तो रचे बदलाव कहकर
किन्तु सीरत कौन सी उज्वल रही है।५।
*
दौड़ती नफरत सदा हर ओर है तब
प्रीत क्यों अभिशप्त सी निश्चल रही है।६।
*


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 6, 2025 at 11:34am

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, आपके सकारात्मक प्रयास के लिए हार्दिक बधाई 

आपकी इस प्रस्तुति पर कुछेक सुझाव वाकई मननीय हैं. विश्वास है, आप तदनुरूप अभ्यासरत होंगे.

आपके माध्यम से सभी अभ्यासी सदस्य-मित्रों को मेरी एक सलाह जरूर होगी, कि किसी प्रस्तुति की पंक्तियों को उसके विन्यास के क्रम में कई-कई ढंग से लिखें. ताकि जबतक आपकी सोच को उचित शब्द न मिलें और पंक्ति जबतक आवश्यक संप्रेषणीय न हो जाय, उस पर काम चलता रहे. हो सकता है, इसमें कुछ दिन ही क्यों न लग जाएँ. इसके बाद प्रस्तुतियों पर जो सुझाव आते हैं ए भाव-दशा को संतुष्ट करते हुए होते हैं. व्याकरण सम्बन्धी चर्चाओं से उक्त प्रस्तुति एक तरह से स्वतंत्र हो जाती है. 

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 5, 2025 at 12:04pm

बड़ी ही अच्छी ग़ज़ल हुई आदरणीय धामी जी बहुत-बहुत धन्यवाद और बधाई....

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 4, 2025 at 10:55pm

  आदरणीय भाई लक्षमण धामी जी सादर, वाह ! उम्दा ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई स्वीकारें. उज्वल/उज्ज्वल. सादर 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 3, 2025 at 11:09am

आदरणीय लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ।... मतले पर आदरणीय भंडारी जी से सहमत हूँ। 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, प्रस्तुत दोहों की सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर"
2 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय जयहिंद रायपुरी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर आपने  दोहा छंद रचने का सुन्दर प्रयास किया है।…"
2 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  सही कहना है हम भारतीय और विशेषकर जो अभावों में पलकर बड़े हुए हैं, हर…"
3 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभाजी हार्दिक धन्यवाद आभार आपका"
3 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  हार्दिक धन्यवाद आभार आपका।"
3 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर मेरी प्रस्तुति की सराहना के लिए आपका हार्दिक…"
3 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"    आदरणीया प्रतिभा पाण्डे जी सादर, प्रस्तुत दोहों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार ।…"
3 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"किल्लत सारे देश में, नहीं गैस की यार नालियाँ बजबजा रही, हर घर औ हर द्वार गैस नहीं तो क्या हुआ, लोग…"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। दोहों पर आपकी विस्तृत टिप्पणी और सुझाव के लिए हार्दिक…"
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. प्रतिभा बहन, सादर अभिवादन। चित्रानुरूप सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
5 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"*पका न पाती  रोटियाँ, भले  युद्ध की आगजला रही है नित्य पर, वह निर्धन का…"
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त चित्रानुरूपसुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
6 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service