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अय तिरंगे शान तेरी कम ना होने देंगे हम

तू हमारा दिल जिगर है तू हमारी जान है

तू भरत है तू ही भारत तू ही हिन्दुस्तान है

अय तिरंगे शान तेरी कम ना होने देंगे हम

तू हमारी आत्मा है तू हमारी जान है |



तेरी खुशबू से महकती देश की माटी हवा

हर लहर गंगा की तेरे गीत गाती है सदा

तू हिमालय के शिखर पर कर रहा अठखेलियां

तेरी छांव में थिरकती प्यार की सौ बोलियां

तू हमारा धर्म है मजहब है तू ईमान है |



जागरण है रंग केसरिया तेरे अध्यात्म का

चक्र सीने पर है तेरे स्फुरित विश्वास का

भारती की…
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Added by jagdishtapish on August 13, 2010 at 9:47am — 4 Comments

15 अगस्त पर विशेष

(15 अगस्त पर विशेष)



हर प्राचीर पर लहराता तिरंगा भारत की स्वतंत्रता की गाथा को दोहरा रहा है। स्वतंत्र्ाता सबको मिले। हमें बहुत कुछ मिला है। लेकिन क्या यह बहुत कुछ हम सभी भारतवासियों ने पाया है? मिलने और पाने में बहुत अंतर है।



देश में दो बार परमाणु परीक्षण किए गए तो बाबरी मस्जिद का विध्वंस और उसके बाद देश भर में फैली हिंसा ने भी हमें यह सोचने पर विवश किया कि क्या साम्प्रदायिकता के आधार पर देश के विभाजन के बाद भी हमने इससे कोई सबक लिया? गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसा देश झेल… Continue

Added by Jaya Sharma on August 13, 2010 at 5:02pm — 6 Comments

पंद्रह अगस्त पर

कल पंद्रह अगस्त है. मैंने सोचा की कुछ लिखूं इस स्वतंत्रता दिवस पर. लिखने बैठा तो कुछ या पंक्तियाँ बनी मेरे मस्तिस्क और ह्रदय में. मई उनको आपके सामने रख रहा हूँ|



वर्षों से थी पराधीनता से भारत माता ग्रस्त|

समय सुहाना सैंतालिस का, आया पंद्रह अगस्त||



आया पंद्रह अगस्त हुआ था नया सवेरा|

देश हुआ आज़ाद, फिरंगियों ने भारत छोड़ा||



गैरों की मर्ज़ी से था, जो चलता जीवन|

अपने बस में हुआ, खिल गए वन औ' उपवन||



खिंजा हटी बागों से, आया था बहार का… Continue

Added by आशीष यादव on August 14, 2010 at 5:40pm — 5 Comments

तुम कब जानोगे? भारत-पाक विभाजन की ६३वीं बरसी पर

तुम कब जानोगे?









तुम पीछे छोड गये थे

मेरे बिलखते,मासूम पिता को

घुटनों-घुटनों खून में लथपथ

अधजली लाशों और धधकते घरों के बीच

दमघोटूं धुऐं से भरी उन गलियों में

जिसे दौड कर पार करने में वह समर्थ न था.

नफ़रत और हैवानियत के घने कुहासे में

मेरे पिता ने अपने भाईयों,परिजनों के

डरे सहमे चेहरे विलुप्त होते देखे थे.





दूषित नारों के व्यापारियों ने

विखण्डन के ज्वार पर बैठा कर

जो… Continue

Added by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on August 14, 2010 at 11:30pm — 10 Comments

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: गीत भारत माँ को नमन करें.... संजीव 'सलिल'

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना:



गीत



भारत माँ को नमन करें....



संजीव 'सलिल'

*



आओ, हम सब एक साथ मिल

भारत माँ को नमन करें.

ध्वजा तिरंगी मिल फहराएँ

इस धरती को चमन करें.....

*

नेह नर्मदा अवगाहन कर

राष्ट्र-देव का आवाहन कर

बलिदानी फागुन पावन कर

अरमानी सावन भावन कर



राग-द्वेष को दूर हटायें

एक-नेक बन, अमन करें.

आओ, हम सब एक साथ मिल

भारत माँ को नमन करें......

*

अंतर में अब रहे न… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on August 14, 2010 at 11:39pm — 5 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
बड़ी मेहनत से जो पाई वो आज़ादी बचा लेना

बड़ी मेहनत से जो पाई वो आज़ादी बचा लेना

तरक्की के सफ़र में थोडा सा माजी बचा लेना



बनाओ संगेमरमर के महल चारो तरफ पक्के

मगर आंगन के कोने में ज़रा माटी बचा लेना



चुभी थी फांस बनकर गोरी आँखों में कभी खादी

न होने पाए इसकी आज बदनामी बचा लेना



कोई भूखा तुम्हारे दर से देखो लौट ना जाये

तुम अपने खाने में से रोज़ दो रोटी बचा लेना



लगा पाओ वतन पर मरने वालो का कोई बुत भी

कोई नुक्कड़ तुम अपने बुत से भी खाली बचा लेना



(बहरे हज़ज़ मुसम्मन… Continue

Added by Rana Pratap Singh on August 14, 2010 at 10:00am — 5 Comments

जागरण गीत

आज मै आप लोगो की सेवा में एक बार फिर अपनी रचना प्रस्तुत रहा हूँ. मुझे उम्मीद है की ये आप लोगो को पसंद आएगी. और आप लोगो का आशीर्वाद रूपी कमेन्ट अवश्य मिलेगा.

जागरण गीत



पूरब में जगी है भोर, पंछी करने लगे है शोर,

मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,



जग जाएगा तो पायेगा जग में सुन्दर अमूल खजाना,

सोकर खोकर समय चूकि फिर रह जाए पीछे पछताना .

समय के रहते जाग, की अपना हिस्सा ले तू आज,

मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,



अपना सब… Continue

Added by आशीष यादव on August 12, 2010 at 3:08pm — 9 Comments

धर्म और राजनीति

धर्म धुरी है इस जगती की

धर्म सृष्टि का है आधार..

धर्म न्याय से ही सुस्थिर है

इस दुनिया के सब व्यापार.



धर्म सिखाता है बेटे को

माँ का हो पूरा सम्मान..

धर्म मान कर ही सीमा पर

सैनिक देता अपने प्राण ..



सूर्य चन्द्र भी धर्म मान कर

देते हैं प्रकाश उपहार ;

धर्म मान निज वृक्ष फूलते

नदियाँ जल देतीं साभार ...



पत्नी माँ दोनों हैं स्त्री ,

किन्तु पृथक इनका स्थान

माँ माँ है पत्नी है पत्नी,

धर्म कराता इसका… Continue

Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on August 11, 2010 at 3:38pm — 3 Comments


मुख्य प्रबंधक
कविता : बारिश के रंग

हाल- ए- दिल ऊंचे महलों से पूछो जरा,

मस्तियाँ बादलों की कैसी उन्हे लगती हैं,



जब सावन की पहली पड़ती फुहार,

धरा ख़ुशी से सोंधी खुशबू बिखेरती,

बच्चे उछलते कूदते मचलते खेलते,

चेहरे किसानो के उम्मीदों से चमकते,



हाल- ए- दिल झोपड़ियो से पूछो जरा,

आंशु बन बारिश छपरों से टपकती है,



खूब बारिश हुई भरी नदिया और ताल ,

मचलती तितलियाँ भी आँचल संभाल,

हवाओं को भी देखो चलती मदभरी,

दीवाना बनाने को हमें हठ पर अड़ी,



हाल- ए- दिल उन… Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 10, 2010 at 2:30pm — 32 Comments

बाबा की पाती

[आएश और आमश के लिए]





हमारे पास कुछ भी नहीं है



चंद औराक़ गर्दिशे-दौराँ के

चंद नसीहतें जो नस्ल दर नस्ल हम तक पहुंचीं

ऐसा विश्वास जहाँ श्रद्धा के अतिरिक्त

सारे सवाल अनुत्तरित और प्रतिबंधित

हैं



मैं कांपता था , लड़खडाने लगते थे क़दम

पसीने लगते थे छूटने

तुम मत डरना

कभी कुत्ते के भौंकने और बिल्ली के म्याओं म्याओं से



शिनाख्त रखना नहीं

न वजूद के पीछे

भागना

रैपर बन जाना

किसी भी साबुन की… Continue

Added by शहरोज़ Shahroz on August 9, 2010 at 10:30pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
वापस दे दो

जब्त किये है तुमने जो अल्फाज़ अभी वापस दे दो

अपने हिस्से की थोड़ी आवाज अभी वापस दे दो



मेरा ग़म, दिल की मायूसी, या फिर मेरी तन्हाई

दिल में छुपाये मेरे सारे राज अभी वापस दे दो



सूरज से जो लड़ आये थे खालिस जेठ महीने में

उन मदमस्त परिंदों की परवाज़ अभी वापस दे दो



सीमा पार से जो आया है वो बारूद है कर्जे का

मूल को छोड़ो ब्याज बहुत है ब्याज अभी वापस दे दो





अब एक प्यारा सा गाना भी सुनते… Continue

Added by Rana Pratap Singh on August 8, 2010 at 11:00pm — 3 Comments

बेच दूंगा मैं खुद को खरीदेंगे आप

बेच दूंगा मैं खुद को खरीदेंगे आप

सोच के आज आया हूँ बाज़ार में --

दोस्तों मेरी कीमत जियादह नहीं

मैं भी बिक जाउंगा आपके प्यार में |



पहले हर बोल के मोल को तौलिये

'बाद में जो मुनासिब लगे बोलिए ---

बोल से ही तो जाहिर ये होता है के

'कितनी तहजीब होगी खरीदार में



इतनी जुर्रत कहाँ के लगा लूँ गले

ये भी हसरत नहीं के गले.से लगूं ---

जो मजा पा के सौ बार मिलता नहीं

वो मजा खो के पाया है एक बार में |



बिक रही है जमीं बिक रहा… Continue

Added by jagdishtapish on August 9, 2010 at 7:42pm — 3 Comments

हिन्दी वैभव: मगही / भोजपुरी / अंगिका / बघेली / उर्दू खड़ी बोली

हिन्दी वैभव:

हिन्दी को कम आंकनेवालों को चुनौती है कि वे विश्व की किसी भी अन्य भाषा में हिन्दी की तरह अगणित रूप और उन रूपों में विविध विधाओं में सकारात्मक-सृजनात्मक-सामयिक लेखन के उदाहरण दें. शब्दों को ग्रहण करने, पचाने और विधाओं को अपने संस्कार के अनुरूप ढालकर मूल से अधिक प्रभावी और बहुआयामी बनाने की अपनी अभूतपूर्व क्षमता के कारण हिन्दी ही भावी विश्व-वाणी है. इस अटल सत्य को स्वीकार कर जितनी जल्दी हम अपनी ऊर्जा हिन्दी में हिंदीतर साहित्य और संगणकीय तकनीक को आत्मसात करेंगे, अपना और हिन्दी का… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on August 6, 2010 at 7:57pm — 2 Comments

गीत: हर दिन मैत्री दिवस मनायें..... संजीव 'सलिल'

गीत:

हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....

संजीव 'सलिल'

*

हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....

*

होनी-अनहोनी कब रुकती?

सुख-दुःख नित आते-जाते हैं.

जैसा जो बीते हैं हम सब

वैसा फल हम नित पाते हैं.

फिर क्यों एक दिवस मैत्री का?

कारण कृपया, मुझे बतायें

हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....

*

मन से मन की बात रुके क्यों?

जब मन हो गलबहियाँ डालें.

अमराई में झूला झूलें,

पत्थर मार इमलियाँ खा लें.

धौल-धप्प बिन मजा नहीं है

हँसी-ठहाके… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on August 8, 2010 at 11:32am — 3 Comments

लडखडाते हुए तुमने जिसे देखा होगा

लडखडाते हुए तुमने जिसे देखा होगा
वो किसी शाख से टूटा हुआ पत्ता होगा


अजनबी शहर में सब कुछ ख़ुशी से हार चले
कल इसी बात पे घर घर मेरा चर्चा होगा

गम नहीं अपनी तबाही का मुझे दोस्त मगर
उम्र भर वो भी मेरे प्यार को तरसा होगा

दामने जीस्त फिर भीगा हुआ सा आज लगे
फिर कोई सब्र का बादल कहीं बरसा होगा

कब्र में आ के सो गया हूँ इसलिए अय तपिश
उनकी गलियों में मरूँगा तो तमाशा होगा
मेरे काव्य संग्रह ---कनक--से -

Added by jagdishtapish on August 7, 2010 at 8:41pm — 7 Comments


मुख्य प्रबंधक
मेरी दूसरी ग़ज़ल

दो सीधे से सवाल का जवाब दोस्तों ,

क्यों पी रही है मुझको ये शराब दोस्तों ,



मैने शराब पी थी गम भुलाने के लिए

बढ़ने लगी है क्यों मेरी अजाब दोस्तों,



माना कि पी गया मै जश्ने यार मे बहुत ,

डर है जिगर न दे कहीं जवाब दोस्तों ,



इतनी ही गर हसीं है ये प्याले की महेबुबा,

फिर क्यों मिला रहे सुरा में आब दोस्तों,



मैने जवानी जाम संग बितायी शान से,

चर्चा हुई बुढ़ापे की ख़राब दोस्तों ,



कितनी ही मिन्नतों के बाद जिंदगी मिली,

ना… Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 7, 2010 at 1:00am — 27 Comments

yeh kaisaa saawan

यह कैसा सावन
--------------
सावन के झूलों के संग
हिलोरे लेती मैं
और मेरी
सतरंगी चुनर के रंग
कहाँ खो गए
अब के क्यों
बर्फ सी जमी है
सावन मैं
एहसास भी बर्फ सी
सफ़ेद चादर ओढ़े
सो गए.

Added by rajni chhabra on August 6, 2010 at 11:23pm — 4 Comments

कायरता या बुद्ध Copyright ©.







ज्ञात हैं हमें कि हर भाव

इतना शक्तिशाली होता है

कि वो आपका जीवन

बदल दे

असीम शक्ति का

प्रमाण है भाव

व्यक्त न भी हो सके तो

क्या

है वो ही प्रणाम

जो पशुओं और मनुष्य में

करता है चुनाव

एक ऐसा ही भाव है

कायरता।





कायरता, बुजदिली

या जो भी कह लो

अद्भुत शक्ति है इसमें

जो काया पलट दे

और साधारण से

असाधारण , अनुपम में बदल दे

भय हो जब हार… Continue

Added by अनुपम ध्यानी on August 5, 2010 at 10:01pm — 2 Comments

2010 की अगस्त क्रांति Copyright ©

जैसे ही अगस्त आया है



वैसे ही सब कवियों ने



तिरंगा उठाया है



और स्याही में कलम डुबो के



सब को यह दिलासा दिलाया है



कि “हम भूले नहीं हैं



भारत हमारा है”



काला है , गोरा है



अभिशप्त है तो क्या हुआ



दरिद्र है तो क्या हुआ



भ्रष्ट है तो क्या हुआ



बाकी न सही पर



अगस्त आते ही हमे याद



ज़रूर आया है



भारत हमारा है।







शब्दावली से… Continue

Added by अनुपम ध्यानी on August 5, 2010 at 8:30am — 10 Comments

मुक्तिका: मन में दृढ़ विश्वास लिये. संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:



मन में दृढ़ विश्वास लिये.



संजीव 'सलिल'

**

मन में दृढ़ विश्वास लिये.

फिरते हैं हम प्यास लिये..



ढाई आखर पढ़ लें तो

जीवन जियें हुलास लिये..



पिये अँधेरे और जले

दीपक सदृश उजास लिये..



कोई राह दिखाये क्यों?

बढ़ते कदम कयास लिये..



अधरों पर मुस्कान 'सलिल'

आयी मगर भड़ास लिये..



मंजिल की तू फ़िक्र न कर

कल रे 'सलिल' प्रयास… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on August 4, 2010 at 8:37am — No Comments

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