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यह कैसा सावन
--------------
सावन के झूलों के संग
हिलोरे लेती मैं
और मेरी
सतरंगी चुनर के रंग
कहाँ खो गए
अब के क्यों
बर्फ सी जमी है
सावन मैं
एहसास भी बर्फ सी
सफ़ेद चादर ओढ़े
सो गए.

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Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on August 10, 2010 at 2:09pm
रजनी दीदी प्रणाम....

बहुत ही बढ़िया रचना है दीदी...
Comment by sanjiv verma 'salil' on August 8, 2010 at 9:00pm
dhanyavad.
Comment by rajni chhabra on August 8, 2010 at 9:00pm
sanjiv ji, aapki ashawadi soch ko naman
Comment by sanjiv verma 'salil' on August 8, 2010 at 8:42pm
बहुत अच्छी रचना.
मेरे मन ने इसके आगे जो रचा आपको अर्पित.

मैंने हार नहीं मानी है
मुझे मालूम है
एहसासों की बर्फ पिघलेगी
ज़ज्बातों का सूरज निकलेगा
उम्मीदों की किरणें
आंगन-आंगन चकफेरा लगाएंगी
चूनर के सतरंगी रंग
देखने के लिये.
********

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