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Neelam Upadhyaya's Blog (56)

कुछ हाइकू

 
ईमानदार
बेईमानी बचाता
थक ही गया

 
इन्सान ही हैं
दिन गुजारते जो
तंग गली में

 
जिन्दा दिल हैं
काश समझ पाते
जिन्दा दिल को
 
 
 
बड़ा खतरा
बाहर वाले नहीं
अपने ही हैं

Added by Neelam Upadhyaya on April 12, 2012 at 10:00am — 2 Comments

फुरसत

फुरसत



शहर की  मशहूर सी उस गली के दोनों किनारों पर बने घरों में रोशनी करने के लिए बिजली  के तार एक दूसरे से उलझे हुवे एक घर से दूसरे घर में, दुसरे घर से तीसरे घर में और इसी तरह  गली के सारे घरों से जुड़े हुवे थे. बिजली के इन तारों में उलझ कर एक दिन एक बंदर की मौत हो गयी. गली में बने सभी घरों में रहने वाले लोगों को बंदर की मौत से लगने वाले पाप से छुटकारा पाने की चिंता हो गयी.  गली के सभी बाशिंदओं ने आपस में रायशुमारी करने के…

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Added by Neelam Upadhyaya on April 10, 2012 at 8:30pm — 5 Comments

कुछ हायकू

 

क्या लोकपाल?

अनिश्चय से भरा

शोर शराबा

 

लोक या पाल

लोकपाल का शोर

थम पाएगा?

 

मुश्किल भरा

लोकपाल का रास्ता

चुनावी रिश्ता

 

फिर चुनाव

फिर शुरु हो रहे

चुनावी शोर

Added by Neelam Upadhyaya on December 28, 2011 at 12:30pm — No Comments

कुछ हाइकू

 

 

ऐसा शहर

 ठिठुरती जिन्दगी

सड़कों पर

 

तार-तार है

नज़र अ़दाजी से

इंसानियत

 

जमती साँस

बच पाती अगर

आस किरण

 

एक कतरा

खुशहाली से भरा

उन्मुक्त हँसी

Added by Neelam Upadhyaya on December 27, 2011 at 10:48am — 3 Comments

कोई आया है

 



रमिया बड़ी खुश थी । शहर जो जा रही थी - अपने पोते को देखने जाने का आखिर उसे मौका मिल ही गया था । यह अवसर बनने में समय लग गया और देखते देखते उसका पोता सात साल का हो गया था । महानगर की भागम-भाग भरी जिन्दगी में से न तो उसका बेटा ही समय निकाल पा रहा था और ना ही रमिया गाँव की अपनी खेती गृहस्थी में से समय निकाल पा रही थी । या यूँ कहें कि कुछ अधिक ही व्यस्त थे दोनों ही माँ-बेटे । और रमिया का पोता…

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Added by Neelam Upadhyaya on September 11, 2011 at 8:30pm — 13 Comments

कुछ हाइकू

जीवन क्रम
संगत-असंगत
जड़ चेतन


नदी की धारा
काँपती पतवार
मन भँवर


चढ़ती धूप
लम्बी परछाइयाँ
ढलती धूप


धुप्प अंधेरा
दिए की हिलती लौ
आखरी आस


सूना आंगन
चाँदनी चुप-चाप
व्यथित मन


मन के रिश्ते
छितरे तार-तार
ऐसे बेगाने

बासी हो जातीं
दिल में बसी यादें
टूटें सपने

 

Added by Neelam Upadhyaya on June 1, 2011 at 5:00pm — 5 Comments

कुछ हाइकू

नीली ओढ़नी
रात की चादर
पसरे तारे

 

फूटी है भोर
जागते अरमान
आशा किरण

 

नई रौशनी
उजालों का सफर
बढ़े काफिले

 

साँझ की बेला
सूरज परछाईं
ढलता दिन

 

जीवन चक्र
चलता जाता यूँ ही
बीतते दिन

Added by Neelam Upadhyaya on March 31, 2011 at 10:38am — 3 Comments

हाइकू

मिटा सके जो
अन्तस का अंधेरा
रौशनी कहाँ

सागर में भी
गहराइयाँ कहाँ
डुबा सके जो


पैसा ही पैसा
पर नहीं है कहीं
मन का सुख


खुश हो सकें
सबकी खुशी पर
वो खुशी कहाँ

Added by Neelam Upadhyaya on November 1, 2010 at 1:55pm — 8 Comments

हाइकू

उड़ता जाता
परवाज भरता
मन पखेरू

- - - - -

झूठ की आँधी
तो क्या बुझ जाएगा
सत्य का दीप

- - - - -

मरते रहे
मरते दम तक
दम्भ भरते

- - - - -


क्यों करते हो
जग में रहकर
जग से बैर

Added by Neelam Upadhyaya on October 13, 2010 at 10:10am — 1 Comment

कुछ हाइकू -

कब सुनते
अतीत के सुस्वर
बीतती उमर

- - -

पीपल दादा
सुरसुराती हवा
उदास मन

- - -

झूमती जाती
सुनहली बालियाँ
पगली हवा

- - -

मैं एक नदी
गिरती औ उठती
आगे ही जाती

- - -

स्वर्ग सा सुख
ममता भरी छाँव
माँ की गोद में

- - -

सनता जाता
स्वार्थ के कीचड़ में
ये जग सारा

Added by Neelam Upadhyaya on October 4, 2010 at 4:35pm — 3 Comments

मेरी हाइकू - एक प्रयास

बना ब्लू लेन

कामनवेल्थ गेम्स

लगता जाम



- - - -



घर से निकले

ट्रैफिक में फँसे

अब इंतजार



- - - -





आया सावन

बरस जाता पानी

टपकी छत



- - - -





खिलती धूप

रौशनी में नहाते

झूमते पेड़



- - - -





आया सावन

बरस जाता पानी

टपकी छत



- - - -



खिलती धूप

रौशनी में नहाते

झूमते पेड़



- - - -



साँझ की बेला

पेड़ों के… Continue

Added by Neelam Upadhyaya on September 29, 2010 at 11:40am — 1 Comment

"लखपति भिखारी"

सुबह-शाम - वह रोज दिखता । देह पर उसके गन्दे फटे चीथड़े जैसे कपड़े होते । कन्धे से एक झोला नुमा लटक रहा होता । शहर की मुख्य सड़क के बड़े चौराहे पर, जहाँ से सबसे अधिक गाड़ियाँ गुजरतीं अल्ल-सुबह से आधी रात तक वह वहीं दिखता । जैसे ही सिग्नल की बत्ती लाल होती, अपनी इकलौती टांग पर कूद-कूद कर हर रुकने वाली गाड़ी की खिड़की पर हाथ से ठोकता, दयनीय भाव से गिड़गिड़ाता, पेट पर हाथ फिराता और भूखा होने का भाव जताता हुआ गाड़ी वालों से पैसे मांगता । उसकी पसन्द लेकिन बड़ी सेलेक्टेड होती । उसके 'आर्डर आफ… Continue

Added by Neelam Upadhyaya on August 18, 2010 at 11:51am — 7 Comments

जब भगवान शिव ने सृष्टि की

जब चारों ओर केवल अन्धकार का अस्तित्व था, न सूर्य था न चन्द्रमा और न कहीं ग्रह-नक्षत्र या तारे थे, दिन एवं रात्रि का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था, अग्नि, पृथ्वी, जल एवं वायु का भी कोई अस्तित्व नहीं था, तब एकमात्र भगवान शिव की ही सत्ता विद्यमान थी; और यह वह सत्ता थी जो अनादि एवं अनंत है।



एक बार भगवान शिव की इच्छा सृष्टि की रचना करने की हुई। उनकी एक से अनेक होने की इच्छा हुई। मन में ऐसे संकल्प के जन्म लेते ही भगवान शिव ने अपनी परा शक्ति अम्बिका को प्रकट किया। उन्होंने उनसे कहा, ‘‘हमें सृष्टि… Continue

Added by Neelam Upadhyaya on July 9, 2010 at 4:07pm — 6 Comments

वो पीपल का पेड़

वो पीपल का पेड़ था । सड़क के किनारे - फुटपाथ से लगा - सालो से खड़ा । उस सड़क के इस पार बस स्टैण्ड है । सुबह दफ्तर जाने के लिए इसी बस स्टैण्ड से बस लेती रही हूँ । दफ्तर ही क्यों शहर के किसी भी हिस्से में जाना हो तो बस लेने के लिए यही सबसे नजदीक का बस स्टैण्ड है । पिछले तेइस वर्षों से यही रुटीन है - सुबह साढ़े आठ बजे से पौने नौ बजे के बीच यहाँ पहुँचना होता है ताकि ठीक समय पर बस लेकर ठीक समय पर दफ्तर पहुँचा जा सके । मेरी ही तरह और भी हैं जो उसी समय पर उसी बस में सवार होते हैं । जब तक बस आए,… Continue

Added by Neelam Upadhyaya on June 28, 2010 at 2:46pm — 2 Comments

"एक्सटिंक्ट" होने के कगार पर

पहले वह रोज आती थी

कभी बरामदे के मुंडेर पर बैठती

कभी खिड़की पर

और कभी-कभी तो

हद ही हो जाती जब वो

कमरे के अन्दर तक आ जाती ।



रोज सबेरे

जब उसकी आवाज सुनते

तब लगता

कि सुबह हो गई है

तब शुरू हो जाता

हमारा रोजनामचा ।



दिन ऐसे ही

रोज गुजरते रहे

वह रोज आती रही

हम रोज उसे देखते रहे

फिर एक दिन अचानक

लगा कुछ " मिसिंग" है ।



फिर अखबार में पढ़ा

गौरैया "एक्सटिंक्ट" होने के कगार पर है

एक सदमा… Continue

Added by Neelam Upadhyaya on June 24, 2010 at 3:11pm — 3 Comments

हमार जीवन

माँ - जब हम पैदा भईनी

हम त कुछ न जानत रहनी

कि डायबिटीज भी कुछ होखेला

आ एकरा से जीवन में कुछ फरक परेला

हम त ईहे जानत रहनी कि

अइसही होखत होई - खूब भूख लगत होई -

अइसहीं होखत होई - कबो खूब घुमरी आवत होई

हाथ - पैर झनझनात होई - चश्मा लगवले पर ठीक लऊकत होई I



हमरा खातिर त ई दुनिया

तबो अइसने रहे - सामान्य

हमरा खातिर ई दुनिया

आजो अइसने बा - सामान्य

बाकिर हमार - ना - तहार दुनिया बदल गईल

तब तूं खूब रोवलू

जब तहरा के बतावल गईल… Continue

Added by Neelam Upadhyaya on June 21, 2010 at 11:46am — 6 Comments

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