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Mohammed Arif's Blog (84)

लघुकथा--लूट

भोला ने हाँफते-हाँफते घर में प्रवेश किया और माँ से बोला -" जल्दी से दे......जल्दी से दे....देर न कर...बाहर लूट मची है....लूट मची है... मुझे भी लूटकर लाना है.....।"

" मगर क्या दे दूँ..... किस चीज की लूट मची है....मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा बेटा....?"

" दो-चार खाली डिब्बे और कुछ प्लास्टिक की बोतलें दे दे ।'

" लेकिन क्यों ?"

" तू नहीं समझेगी माँ । कल रात अयोध्या में नई सरकार ने लाखों की संख्या में दीए जलाए थे । दीयों में बचा तेल हमारे जैसे कई गरीब के बच्चे लूट के ले जा रहे हैं… Continue

Added by Mohammed Arif on October 22, 2017 at 7:02am — 26 Comments

लघुकथा--मलिका

" कौन हो तुम ?"
" जन्म से मुस्लिम , मन से सच्चा हिन्दुस्तानी , तन से अधनंगा और पेट से भूखा हूँ ।"
"लेकिन आप यह सब क्यों पूछ रही हैं ?आप कौन हैं ?"
" हा! हा! हा ! हा ! हा !" ज़ोर का अट्टहास किया और बोली-" मुझे दंगों की दुनिया की बेताज मलिका "साम्प्रदायिकता" कहते हैं । " उसने बस इतना ही कहा और एकदम पिस्टल निकालकर दो-तीन गोलियाँ उसकी कनपटी में दाग दी और फरार हो गई ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on October 17, 2017 at 10:59pm — 33 Comments

बीमार कविता

इन दिनों कविता को
थकान और कमज़ोरी है
रागात्मकता पर
हो रहे हैं
लगातार हमलें
काव्य-बोध न होने से
उसके पैर लड़खड़ा रहे हैं
भाव , कल्पना न होने से
कभी-कभी चक्कर खाकर
औंधे मुँह गिर जाती है
जिव्हा भी लड़खड़ा रही है
अभिव्यक्ति न होने से
उसे बार-बार चक्कर आते हैं
सौंदर्यबोध न होने से
अंदर ही अंदर जैसे
उसे घुन लग गई है
क्या कविता भी
डायबिटीक नहीं हो गई है ?

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on October 14, 2017 at 12:00pm — 11 Comments

समय का चक्कर (कटाक्षिकाएँ)

(1) समय के
मोबाइल फोन पर
सिकुड़ती हुई
संवेदना के वायब्रेशन है ।
(2) समय के
जल की शिराओं में
भविष्य का दौड़ता
जल संकट है ।
(3) समय के
दाम्पत्य पर
अलगाव की
लकीरें है ।
(4) समय की कॉकटेल में
महानगर के
बीयर-बार में
नियॉन रोशनी में
तनाव मुक्ति की
शराब उडेली
जा रही है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on October 10, 2017 at 11:32pm — 16 Comments

लघुकथा- भेड़िया

" क्या कहा ,हमेशा के लिए आ गई है । "
"हाँ !हाँ ! हाँ !! कितनी बार कहूँ मैं हमेशा के लिए आ गई हूँ ।" श्वेता ने झुँझलाकर कहा ।
"आखिर क्यों बेटी ?कुछ तो वजह होगी ?"
"वही भेड़िया ।अब वो मौका पाकर मेरा शिकार करना चाहता है । "
अब माँ को अच्छे से समझ में आ गया । भेड़िया और कोई नहीं श्वेता का देवर है क्योंकि वह पहले भी कई बार माँ को बतला चुकी है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on October 7, 2017 at 11:30pm — 7 Comments

लघुकथा - पर्यावरण-प्रेमी

"बधाई हो मिश्रा जी , हार्दिक बधाई आपको । कल के सारे अखबारों में आपकी न्यूज़ थी । सभी अखबारों ने बड़ी प्रमुखता से आपके "एण्टी-पॉलिथीन कैम्पेन " के बारे में छापा है । बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप पर्यावरण के लिए । वाकई पॉलिथीन बहुत खतरनाक है । इससे कई गायें भी काल के गाल में समा रही है ।"

" जी, गुप्ता जी ! मेरा मिशन है पॉलिथीन मुक्त पर्यावरण । चाहता हूँ सरकार इस पर पूरी तरह से बैन लगा दें । बस ! इसी में लगा हूँ । "

" देश को आप जैसे पर्यावरण बचाव योद्धाओं की ज़रूरत है ।"

" गुप्ता जी… Continue

Added by Mohammed Arif on October 4, 2017 at 4:08pm — 16 Comments

ग़ज़ल (बह्र -फेलुन) यह ग़ज़ल दुनिया की सबसे छोटी ग़ज़ल है। इसे "गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स" में शामिल किया गया है ।

*जीवन
उलझन ।

* सूने
आँगन ।

* घर-घर
अनबन ।

* उजड़े
गुलशन ।

* खोया
बचपन ।

*भटका
यौवन ।

* झूठे
अनशन ।

* ख़ाली
बरतन ।

* सहमी
धड़कन ।

.
मौलिक और अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on September 23, 2017 at 11:30pm — 66 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/22)

उसको फिर वापस आना है ,
मुझको भी तो समझाना है ।

अब उसकी यादों से हरदम ,
अपने दिल को बहलाना है ।

दूर सदा जो रहते भाई ,
उनको घर वापस लाना है ।

नाम इसी का जीवन देखो ,
हर मुश्क़िल से टकराना है ।

इस दुनिया में सबसे प्यारा ,
अब भारत देश बनाना है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on September 6, 2017 at 9:55pm — 8 Comments

ग़ज़ल (22/22/22/2)

कैसी ये बदहाली है ,
हर इंसान सवाली है ।

सूखे-सूखे होंठ सभी ,
उस चहरे पे लाली है ।

कौन ग़मों से बच पाया ,
सबने पीड़ा पाली है ।

जब से कूच कर गई माँ ,
घर भी खाली-खाली है ।

सब समझे हैं सभ्य उसे ,
गुंडा और मवाली है ।

ख़ुशियाँ रूठी बैठी है ,
ग़ुर्बत में दीवाली है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on September 1, 2017 at 5:37pm — 17 Comments

लघुकथा--कॉमेडियन

"माँ , आज तुमको बताना ही होगा ?" राजू बोला ।
"क्या ?" माँ बोली ।
"यही कि तुम मेरे आज तक के किसी भी एक्ट पर नहीं हँसी । मेरे एक्ट पर तुम्हें हँसी क्यों नहीं आती ? मेरे एक्ट से लोगों के पेट में बल पड़ जाते हैं । सारा शहर मुझे " राजू द ग्रेट
कॉमेडियन " कहता है ।"
" बेटा , जब हमारी भूख , गरीबी , अभाव , पीड़ा और तेरे पिता की कैंसर से मौत ने तुझे ग्रेट कॉमेडियन बना ही दिया है तो मुझे हँसने की क्या ज़रूरत है ।" राजू की आँखों से आँसू छलक पड़े ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on August 23, 2017 at 10:00pm — 19 Comments

लघुकथा--इशारा

हवलदार -" नये थानेदार साहब आज दौरे पर निकले थे । तुम्हारी दुकान पर भी निगाह गई थी । तुमने सामान बाहर सड़क तक जमा रखा है । इससे यातायात में लोगों को दिक्कत आती है ।" हवलदार का इतना कहना ही था कि
घबराकर दुकान संचालक अनिल बोला -"जी...जी...जी... आज के बाद सामान बाहर नज़र नहीं आएगा ।"
"नहीं , नहीं थानेदार साहब का इशारा किसी दूसरी चीज़ की ओर है ।" हवलदार कहते हुए चला गया मगर अनिल को इशारा बहुत देर बाद समझ में आया ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on August 19, 2017 at 11:30pm — 11 Comments

एक कविता जश्ने आज़ादी के नाम

सत्तर बरस आज़ादी के,

याद करो क़ुर्बानी के ।

वो तो सब परवानें थे ,

भारत माँ के दीवानें थे

हँसते हुए प्राण गंवाए,

वीर शहीद वो कहलाए ,

माँ का हर वचन निभाया ,

देकर रक्त कर्ज़ चुकाया ।

सत्तर बरस.......

आज़ादी की मशाल थे ,

भारत भूमि की ढाल थे ,

शौर्य के अंगारे थे ,

इंकलाब के नारे थे ,

सब साहस की उड़ान थे

वीरता की पहचान थे ।

सत्तर बरस......

हर वीर एक ज्वाला था ,

क्रांति का मतवाला था

जब विपदा आन पड़ी थी ,

जवानी… Continue

Added by Mohammed Arif on August 15, 2017 at 12:02am — 9 Comments

लघुकथा---सोच

देर रात चार-पाँच लड़कियों का झुंड बदहवास , घबराया हुआ जब पुलिस स्टेशन में दाखिल हुआ तो पुलिस वालों के भी होश उड़ गए । पहले उन्हें बैठाया गया । ढाँढस बँधाया । फिर थानेदार साहब ने कहा-"हाँ , अब बताइए क्या हुआ ?"

" कुछ लड़कों ने हमारी कार का पीछा किया , हमें किडनैप करने की कोशिश की । बड़ी मुश्किल से जान बचाकर यहाँ तक आईं हैं ।" उनमें से एक लड़की ने आपबीती सुनाई ।

" देर रात आप घर से बाहर क्यों निकली ?" थानेदार साहब ने आखिर अपनी औकात बता ही दी ।

" यदि आप लड़कों को देर रात घर से बाहर न… Continue

Added by Mohammed Arif on August 8, 2017 at 6:43pm — 13 Comments

लघुकथा --बंधन

"सुशील , शालिनी को लेने कब जाएगा ?" माँ ने चिंतित स्वर में कहा ।
" कब है रक्षा-बंधन ?"
"बस ! आज से ठीक चार दिन बाद ।
"मगर...मगर...।"
" क्या मगर , मगर ।'
" कुछ नहीं माँ.....।"
अब सुशील माँ से कैसे कहे कि उसने शालिनी की मोटी उधार की रकम आज तक नहीं चुकाई जो माँ के बग़ैर पूछे ले आया था ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on August 6, 2017 at 12:17am — 9 Comments

लघुकथा-- बर्थ-डे गिफ्ट

राहुल और साक्षी के जीवन में तनाव उस समय उत्पन्न हो गया जब साक्षी ने अपने सात वर्षीय बेटे अंशुल की ज़िम्मेदारी उठाने की अर्ज़ी कोर्ट में लगा दी । दर असल राहुल काम के संबंध में लंदन जाना चाहता था । साक्षी को सतारा में ससुराल में रहने को कहा । मगर साक्षी को पुणे में रहकर ही जॉब करना था । विवाद यहीं से पैदा हुआ । एक दिन राहुल अंशुल को लेकर सतारा आ गया और उसकी पढ़ाई लिखाई की व्यवस्था करने लगा । साक्षी को बस यही नगवारा लगा ।

अंशुल के बर्थ-डे वाले दिन ही दोनों ने अलग होने का निर्णय ले लिया… Continue

Added by Mohammed Arif on August 2, 2017 at 11:13pm — 10 Comments

लघुकथा-कुत्ता संस्कृति

मॉर्निंग वॉक के दो मित्र कुत्ते आपस में बतिया रहे थे । उन्हें अपने कुत्तेपन पर बड़ा अभिमान हो रहा था । इंसान के गिरते निकम्मेपन पर ठहाके भी बीच-बीच में लगाते जा रहे थे । पहला कुत्ता बोला-"हमें अपने कुत्तेपन पर नाज़ है ।" तब दूसरा कुत्ता उछलकर बोला -"व्हाय नॉट । वी आर सो फेथफुल ।"

पहला-"हममें से कुत्तापन के संस्कार धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे है । हम तेज़ी से सभ्य हो रहे हैं ।"

दूसरा-"एब्सोल्यूटली ! अगली सदी हमारी ही होगी ।"

पहला-"बेशक! हमारा आधिपत्य बढ़ता ही जा रहा है । हमने इंसान के… Continue

Added by Mohammed Arif on July 26, 2017 at 7:44pm — 13 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)

बाक़ी थोड़ा बचपन है,
ये उसका भोलापन है ।
रूठे-रूठे चहरें हैं,
अब घर-घर सूनापन है ।
जतलाता है हरदम वो,
ये उसका ओछापन है ।
हाँ, उसकी रचनाओं में,
रहता कुछ तो चिंतन है ।
उनसे रिश्ता है लेकिन ,
रहती थोड़ी अनबन है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on July 24, 2017 at 2:45pm — 17 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/22)

ये रंजिश का दौर नया है ,

हाँ, साज़िश का दौर नया है ।

कितने बेबस चहरे देखो ,

फिर यूरिश का दौर नया है ।

हम क्या खायें, क्या पहनें अब ,

बस, काविश का दौर नया है ।

भाई-भाई का दुश्मन है ,

ये सोज़िश का दौर नया है ।

शक हर इक पर है अब यारो ,

हाँ, पुरसिश का दौर नया है ।

धन-दौलत के दीवाने सब ,

पैमाइश का दौर नया है ।

सूखी-सूखी नदियाँ हैं सब ,

अब बारिश का दौर नया है… Continue

Added by Mohammed Arif on July 20, 2017 at 12:07am — 14 Comments

सावन की ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/22)

मन में आग लगाये सावन ,
यौवन को भड़काये सावन ।
दो दिल मचल रहे हैं देखो ,
ऐसा राग सुनाये सावन ।
छैल-छबीला , रंगीला-सा ,
बाग़ों में इतराये सावन ।
छन-छन छन-छन करता छत पर
बेहद शोर मचाये सावन ।
खेतों में हरियाली लाये ,
संग घटा के छाये सावन ।
मस्ती में जब झूमे नाचे
ऐसा रंग जमाये सावन ।
गीत मिलन के गाता है ये
झूलों में इठलाये सावन ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on July 16, 2017 at 2:09pm — 20 Comments

ग़ज़ल / बह्र -22/22/22/22

जीने में अब मजा कहाँ है,
खुशियों का सिलसिला कहाँ है ।
बारिश कोसों दूर हुई अब
जल का बादल गया कहाँ है ।
जो हैं हिंसा के सौदागर
उनको मिलती सज़ा कहाँ है ।
रहबर करते वादे बेहद ,
कोई पूरा हुआ कहाँ है ।
माँ है उनकी जीवित अब तक
घर का हिस्सा हुआ कहाँ है
भूल चुका है वो तो ये भी,
भाई उसका बसा कहाँ है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on July 9, 2017 at 7:00pm — 12 Comments

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