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Ashok Kumar Raktale's Blog (77)

‘वागीश्वरी’ सवैया पर एक प्रयास

१२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२

भजो राम को या भजो श्याम को या, भजो नित्य ही मित्र माँ बाप को |

चुनों धर्म का मार्ग सच्चा हमेशा , बढ़ावा न देना कभी पाप को,

सिखाना सभी को सिखाना स्वतः को, भुलाना यहाँ व्यर्थ संताप को,

नई ये हवाएं कहें क्या सुनो तो, सुनो थाप को वक्त की चाप को ||

तजो लाज सारी करो कर्म अच्छे, रहोगे जहां में तभी शान से |

न लेना किसी का न देना किसी का, जिलाता यही मार्ग सम्मान से,

बिना कर्म पाते सभी दुःख देखो,…

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Added by Ashok Kumar Raktale on November 5, 2016 at 10:53pm — 9 Comments

माता मैं ना जाऊँगा

कितने कष्ट सहे हैं तूने , कैसे मुझे पढ़ाया है,

तुझे छोड़कर घर से बाहर, मैंने कदम बढाया है |

अनचाहे ही माता तुझको , मैंने आज रुलाया है

भाग्य विधाता ने भी देखो, कैसा खेल रचाया है ||

 

 

रुक जाता मैं माता क्षणमें, बस कहने की देरी थी,

जाऊँ मैं परदेस मगर माँ, ये जिद भी तो तेरी थी |

देवों को नित पूजा तूने , माला भी नित फेरी थी,

तुझको छोड़ कहीं जाऊँ मैं, ये ईच्छा कब मेरी थी ||

 

 

दमकुंगा बन कुंदन लेकिन, काम न तेरे…

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Added by Ashok Kumar Raktale on September 17, 2016 at 9:30pm — 13 Comments

हर कली अब कमल हो रही है

212  212  212  2

 

जिन्दगी अब सरल हो रही है

बात हर इक गजल हो रही है 

 

दलदली हो चुकी है जमीं पर,

हर कली अब कमल हो रही है

 

तितलियाँ भर रहीं हैं उड़ानें

नीति बेशक सफल हो रही है

 

आ रहा है कहीं से उजाला

रौशनी आजकल हो रही है

 

मखमली हो रही हैं हवाएं

मेंढकी भी विकल हो रही है

 

है दरोगा बड़ा लालची वो

धारणा अब अटल हो रही है

 

मौलिक/अप्रकाशित.

Added by Ashok Kumar Raktale on July 28, 2016 at 11:00pm — 15 Comments

मन उस आँगन ले जाए ( गीतिका )

 

आकर साजन तू ही ले जा क्यूँ ये सावन ले जाए

अधरों पर छायी मस्ती ये क्यूँ अपनापन ले जाए

 

भिगो रहा है बरस-बरस कर मेघ नशीला ये काला

कहीं न ये यौवन की खुश्बू मन का चन्दन ले जाए

 

कड़क-गरज डरपाती बिजली पल-पल नभ में दौड़ रही

कहीं न ये चितवन के सपने संचित कुंदन ले जाए

 

बिंदी की ये जगमग-जगमग खनखन मेरी चूड़ी की,

बूँदों की ये रिमझिम टपटप छनछन-छनछन ले जाए

 

पुहुप बढाते दिल की धड़कन शाखें नम कर डोल…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 20, 2016 at 1:00pm — 28 Comments

दुश्मन नए मिले.

२२१  २१२१ १२२१ २१२

 

जब छीनने छुडाने के साधन नए मिले

हर मोड़ पर कई-कई सज्जन नए मिले

 

कुछ दूर तक गई भी न थी राह मुड़ गई

जिस राह पर फूलों भरे गुलशन नए मिले

 

काँटों से खेलता रहा कैसा जुनून था

उफ़! दोस्तों की शक्ल में दुश्मन नए मिले

 

जितने भी काटता गया जीवन के फंद वो  

उतने ही जिंदगी उसे बंधन नए मिले

 

अपनों से दूर कर न दे उनका मिज़ाज भी  

गलियों से अब जो गाँव की आँगन नए…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 18, 2016 at 2:00pm — 19 Comments

सभी नादान बन गए

२२१  २१२१ १२२१ २१२

 

ये रूप रंग गंध सभी  शान बन गए

कुछ रोज में ही जो मेरी पहचान बन गए

 

नफरत के सिलसिले जो चले धूप छाँव बन

इंसानियत के शब्द भी मेहमान बन गए

 

तुम-तुम न रह सके न ही मैं-मैं ही बन सका

दोनों ही आज देख लो शैतान बन गए

 

खेमों में बँट गए हैं सभी आज इस तरह

कुछ राम बन गए कई रहमान बन गए

 

हद के सवाल पर या कि जिद के सवाल पर

हद भूलकर गिरे सभी नादान बन…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 17, 2016 at 9:35am — 5 Comments

तम से लड़ी है जिंदगी

2122  2122  2122  212

मौत है निष्ठूर निर्मम तो कड़ी है जिंदगी

जो ख़ुशी ही बाँटती हो तो भली है जिंदगी

 

लोग जीने के लिए हर रोज मरते जा रहे

ये सही है तो कहो क्या फिर यही है जिंदगी

 

दो निवालों के लिए दिनभर तपाया है बदन

या कि मानव व्यर्थ चाहत में तपी है जिंदगी  

 

झूठ माया मोह रिश्ते सब सही लगते यहाँ

जाने कैसे चक्रव्यूहों में फँसी है जिंदगी

 

काठ का पलना कहीं तो खुद कहीं पर काठ है

है हँसी…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 9, 2016 at 7:00pm — 18 Comments

कुण्डलिया

छाये नभपर घन मगर, सहमी है बरसात |

देख धरा का नग्न तन, उसे लगा आघात ||

उसे लगा आघात, वृक्ष जब कम-कम पाए,

विहगों के वह झूंड, नीड जब नजर न आए,

अब क्या कहे ‘अशोक’, मनुज फिरभी इतराए,

झूठी लेकर आस, देख घन नभ पर छाए ||

 

 

कहीं उडी है धूल तो, कहीं उठा तूफ़ान |

देख रहा है या कहीं, सोया है भगवान ||

सोया है भगवान, अगर तो मानव जागे,

हुई कहाँ है भूल , जोड़कर देखे तागे,

जीवन की यह राह, गलत तो नहीं मुड़ी है

देखे क्यों…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 6, 2016 at 8:59am — 2 Comments

गजल

२२१२ २२१२ २२

 

हमने यहीं पर ये चलन देखा

हर गैर में इक अपनापन देखा

 

देखी नुमाइश जिस्म की फिरभी

जूतों से नर का आकलन देखा

 

हर फूल ने खुश्बू गजब पायी

महका हुआ सारा  चमन देखा

 

लिक्खा मनाही था मगर हमने

हर फूल छूकर आदतन देखा

 

उस दम ठगे से रह गए हम यूँ  

फूलों को भँवरों में मगन देखा

 

होती है रुपियों से खनक कैसे

हमने भी रुक-रुक के वो फन देखा

 

रोशन चिरागों…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 2, 2016 at 6:40pm — 14 Comments

मनहरण घनाक्षरी

मंद चलती पवन , शांत रहती अगन,
भोर सा उल्लास प्रभु आठों याम चाहिए,
तप्त धरती गगन , और जलता बदन,
ग्रीष्म प्रभू और नहीं ना ही घाम चाहिए,
आयें घन लिए नीर हरें व्याकुलों कि पीर,
एक वरदान भगवान राम चाहिए,
एक बनें नेक बनें, हिलमिल सब रहें,
वसुधा पे ऐसा प्रभु सुखधाम चाहिए ||


मौलिक/अप्रकाशित.

Added by Ashok Kumar Raktale on May 27, 2016 at 10:48pm — 7 Comments

दुर्मिल सवैया

दुर्मिल सवैया.

 

 

बदली - बदली मुख फेर लिया जब सूरज लालमलाल हुआ,

वन शुष्क हुआ हर एक हरा सच शुष्क भरा हर ताल हुआ,

तन शुष्क हुआ मन शुष्क हुआ हर ओर भयंकर हाल हुआ,

जब घाम बढ़ा तब सत्य कहूँ यह हाल बड़ा विकराल हुआ ||

 

 

तन ताप लिए तन आग लिए सब व्याकुल हैं तन प्यास लिए,  

दिन मानव के खग के वन के पशु के कटते बस आस लिए,

सब सोच रहे अब ग्रीष्म टले बरसे बदली मृदु भास लिए,  

निकले फिरसे बरसात लिए दिन सावन भादव मास लिए…

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Added by Ashok Kumar Raktale on May 22, 2016 at 3:40pm — 6 Comments

किस तरह का ये कहो नाता है.

वज्न - 2122---1122---22 / 112

किस तरह का ये कहो नाता है

उनके बिन पल न रहा जाता है

 

लूट ले जाता है खुशियाँ सारी

उसका जाना न हमें भाता है

 

रात लाती है उम्मीदें लेकिन

दिन का सूरज हमें तड़पाता है

 

धूल हो जाते हैं अरमां सारे,

चैन इस दिल को नहीं आता है

 

रात आती है सितारे लेकर

चाँद रातों की नमी लाता है

 

मौलिक/अप्रकाशित.

Added by Ashok Kumar Raktale on April 24, 2016 at 4:30pm — 12 Comments

गीत

इस गीत के सभी अंतरे “हीर छंद” (६,६,११. आदि गुरु अंत रगण) पर आधारित हैं.

 

 

मानव है, मानव बन, मानव का प्यार ले,

बैर भूल, द्वेष मिटा, जिंदगी सँवार ले ||

  

लोक लाज, भूल गया, कैसा मनु कर्म…

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Added by Ashok Kumar Raktale on November 8, 2015 at 10:00am — 4 Comments

कुछ दोहे !

झुमका झांझर चूड़ियाँ, करधन नथ गलहार |

बिंदी देकर मांग भर,.....कर साजन सिंगार ||

 

सूनी सेज न भाय रे, छलकें छल-छल नैन |

पी-पी कर रतिया कटे,....दिन करते बेचैन ||

 

उस आँगन की धूल भी, करती है तकरार |

अपनेपन से लीपकर , जहां बिछाया प्यार ||

 

हरियाली घटने लगी, कृषक हुए सब दीन |

राजनीति जब देश की, खाने लगी जमीन ||

 

टहनी के हों पात या, हों फुनगी के फूल |

दोनों तरु की शान हैं, तरु दोनों का मूल ||…

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Added by Ashok Kumar Raktale on October 8, 2015 at 7:00pm — 8 Comments

दोहा गीत (एक प्रयास)

मनुज रूप मैं पा गया,

हुआ स्वप्न साकार

 

 

कोमल किरणे भोर की,

बिखराती जब नेह है,

दिखती उल्लासित धरा

आन्दंदित हर देह है.

 

सचमुच एक सराय सा

लगा मुझे संसार

 

प्यार भरे व्यवहार से

मिलती देखी जीत है,

बना एक अनजान जब,

मेरे मन का मीत है

 

सच्ची निष्ठा ने किया,

हरदम बेडा पार

 

लोभ मोह माया कपट,

सारे लगते काल हैं,

सत्य यहाँ है मौत ही,

बाकी सब…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 9, 2015 at 9:07am — 14 Comments

चुनावी चौसर ! (चौपई छंद)

छिड़ी हुई शब्दों की जंग | दिखा रहे नेता जी रंग ||

वैचारिकता नंगधडंग | सुनकर हैरत जन-जन दंग ||

जाति धर्म के पुते सियार | इनपर कहना है बेकार ||

बात-बात पर दिल पर वार | जन मानस पर अत्याचार ||

 

पांच वर्ष में एक चुनाव | छोड़े मन पर कई प्रभाव ||

महँगाई भी देती घाव | डुबो रही है सबकी नाव ||

नारी दोहन अत्याचार | मिला नहीं अबतक उपचार ||

सरकारें करती उपकार | निर्धन फिरभी हैं बीमार ||

 

तीर तराजू औ तलवार | किसे कहें अब जिम्मेदार…

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Added by Ashok Kumar Raktale on April 23, 2014 at 2:00pm — 27 Comments

दोहे-मोहें.

नेकनीयती वृन्द के, मुरझाये..….हैं फूल |

कहकर पुष्प गुलाब का, दिए सैकड़ों शूल ||

 

बही नाव……..पतवार भी, तूफानों की धार |

बढ़ा प्रेम तब सरित का, जब पाया मँझधार ||

 

कुल की करुणा कान में, बोली थी चुपचाप |

देख समय सूरज चढा, तू भी इसको भाप ||

 

अवसर का उपहास है, अनजाने ही हार |

भोग रहे पीड़ा कई, गए समय की मार ||

 

कागज़ पर लिखता रहा, विरह प्रेम के गीत |

जुडी कलम की छंद से, अनजाने ही प्रीत ||

 

तप…

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Added by Ashok Kumar Raktale on December 10, 2013 at 9:30pm — 13 Comments

हँसते रहे रोते रहे |

गूंजती थी जब खमोशी, हादसे होते रहे |

रात जागी थी जहां पर दिन वहीँ सोते रहे ||

 

अनमने से भाव थे वह अनमनी सी थी नजर

अनमने सिंगार पर ही मुग्ध हम होते रहे ||

 

कौंध कर बिजली गिरी वसुधा दिवाकर भी डरा,

कुंध तनमन क्रोध संकर बीज हम बोते रहे ||

 

भावना विचलित हुई जब चीर नैनो से हटा,

चार अश्रु गिर धरा पर माटी में खोते रहे ||

 

पीर बढती ही गई जब भावना के वेग से,

हम किनारे पर रहे हर शब्द को धोते रहे…

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Added by Ashok Kumar Raktale on November 20, 2013 at 7:00pm — 25 Comments

कुछ दोहे

जीवन में सद्काम का,........... हुआ सदा सम्मान |

आये दिन अब कर्म के,........ जाने सजग किसान ||

 

कारी रैना भोर में,..................... बीती देकर ज्ञान |

चार प्रहर में दोपहर,.............…

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Added by Ashok Kumar Raktale on May 22, 2013 at 10:00pm — 7 Comments

अरु नदिया पछताय ( कुछ दोहे )

नदिया का यह नीर भी, कुछ दिन का ही हाय |

उथला जल भी नहि बचा, जलप्राणी कित जाय ||

नदिया जल मल मूत्र सब, कैसा बढ़ा विकार |

मानव अवलम्बित धरा, सहती अत्याचार ||

क्षुधा तृप्त करता…

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Added by Ashok Kumar Raktale on April 30, 2013 at 8:07am — 22 Comments

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