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योगराज प्रभाकर's Blog (62)

भारत भाग्य विधाता (लघुकथा)

"अरे ताऊ इलेक्शन आ गए हैं, इस बार वोट किस को दे रहे हो ?"

"अरे हमें तो अभी ये ही नहीं पता कि इस बार ससुरा खड़ा कौन कौन है।"

"एक तो वही कुर्सी पार्टी वाला है।"

"अरे वो चोर ? छोडो, साले पूरा देश लूट कर खा गये।"

"नई पार्टी वाला भी खड़ा है।" 

"कौन ? वो जो आपस में लोगों को लड़ाता फिरता है? दफ़ा करो उसको।"

"एक नीली पार्टी वाली भी है न।"

"उसको वोट दे दिया तो पीछे वाली बस्ती सर पर मूतेगी हमारे।"

"तो फिर कामरेडों को वोट किया जाए?"

"कौन वो ज़िंदाबाद मुर्दाबाद…

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Added by योगराज प्रभाकर on June 2, 2015 at 12:25pm — 20 Comments

बुनियाद (लघुकथा)

"कितने शर्म की बात है, हमारे आका लोग दुनिया भर से अरबों खरबों भेज चुके हैं, मगर तुम लोग फिर भी आज तक हिन्दुस्तान के टुकड़े नही कर पाए।"

"हमने हरचन्द कोशिश की, मगर ....."

"मगर क्या ?"

"ये लोग टूटते ही नहीI"

"क्यों नही टूटेंगे ? तुम इनको धर्म के नाम पर क्यों नही तोड़ते?"

"हम कश्मीर और पंजाब समेत कई जगहों पर ये कोशिश पहले ही कर चुके हैं सर।"

"कोशिश कर चुके हो तो कामयाब क्यों नही हुए अब तक?"

"क्योंकि इस देश की बुनियाद नफ़रत पर नही प्रेम पर रखी गई है…

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Added by योगराज प्रभाकर on May 5, 2015 at 10:30pm — 15 Comments

बोझ (लघुकथा)

"बापू, हमारे साथ शहर क्यों नहीं चलते ?"
"शहर जा बसेंगे तो खेती कौन करेगा ?"  
"क्या रखा है खेती में ? कभी सूखा फसल को मार जाता है तो कभी बेमौसम बरसात।"
"तुम्हें कैसे समझाऊँ बेटा।"
"खुल कर बताओ बापू, दिल पर कोई बोझ है क्या ?"
"ये अन्नदाता की उपाधि का बोझ है बेटा, तुम नहीं समझोगे ।"      
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(मौलिक एवँ अप्रकाशित)

Added by योगराज प्रभाकर on April 21, 2015 at 5:04pm — 18 Comments

दो लघुकथाएँ - (अम्बेदकर जयंती पर)

(१). बदरंग संवेदनाएँ



"घोषणा करवा दो कि कल हम पूरा दिन अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे।"    

"क्यों नेता जी ? कल तो कोई व्रत उपवास भी नहीं है।"

"अरे कल अम्बेदकर जयंती है न, पता नहीं किस किस बस्ती में जाना पड़ जाए ।"  

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(२). सफ़ेद साँप



"आज तो स्पेशल जश्न होना चाहिए।"

"तो भेजें किसी को दारू सिक्का लाने ?"

"दारू सिक्के के साथ साथ मेरे लिए नत्थू की लौंडिया पकड़ कर…

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Added by योगराज प्रभाकर on April 15, 2015 at 4:00pm — 17 Comments

कामवाली (लघुकथा)

"अरी भागवान, क्यों हमेशा कामवाली के पीछे हाथ धोकर पडी रहती हो ?"

"आजकल इसका दिमाग बहुत ख़राब हो गया है।"  

"आखिर बात क्या हुई?"  

"एक हो तो बताऊँ। बिना बताये छुट्टी मार जाती है, काम करते हुए मौत पड़ती है इसे, पर एडवांस हर महीने चाहिए मुई को"

"अरे शान्त रहो, वो सुन रही है।"     

"सुनती है तो सुने, गर्मियों के बाद उठा कर बाहर फ़ेंक दूँगी इसको।"

"मगर कामवाली के बगैर घर के इतने सारे काम कौन करेगा ?"

"क्यों ? बेटे की शादी करके नई बहू किस लिए ला रहे हैं…

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Added by योगराज प्रभाकर on February 24, 2015 at 12:48pm — 20 Comments

बलिदानी - (लघुकथा)

मँच पर बुला बुला कर उन सभी बुज़ुर्गों को सम्मानित किया जा रहा था जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था. उनमें से किसी ने जेल काटी थी, किसी ने अंग्रेज़ों की लाठियां खाईं थीं, कोई सत्याग्रह में शामिल था तो कोई भारत छोडो आंदोलन में. उन सभी की देशभक्ति के कसीदे मँच पर पढ़े जा रहे थे. हाथ में तिरँगा पकडे एक बूढा यह सब देख देख मुस्कुराये जा रहा था. जब भी किसी को सम्मान देने के लिए बुलाया जाता तो वह झट से दूसरों को बताता कि यह उसके गाँव का है, या उसका दोस्त है या उसका जानकार है. पास ही खड़े एक…

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Added by योगराज प्रभाकर on August 16, 2014 at 10:30am — 20 Comments

नियति (लघुकथा)

जब से उस युवा चींटे के पँख निकले थे वह हवा बातें करने लगा था. उसने सभी परिजनों और मित्रजनो पर अपने नए नए निकले पँखों का रुआब डालना शुरू कर दिया था, उसका आत्मविश्वास देखते ही देखते आत्ममुग्धता का रूप धारण कर गया। इस बदले हुए स्वरूप को देख देख उसकी माँ रूह तक काँप जाती. लाख समझाने पर भी बेटा यथार्थ के धरातल पर आने को तैयार न हुआ तो एक दिन बूढ़ी माँ ने अपनी बहू को सफ़ेद जोड़ा देते हुए भरे गले से कहा "इसे अपने पास रख ले बेटी।" 

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by योगराज प्रभाकर on July 3, 2014 at 3:20pm — 38 Comments

केक्टस (लघुकथा)

"भई वाह, तुम्हारे हरे भरे केक्टस देख कर तो मज़ा ही आ गया."
"बहुत बहुत शुक्रिया."
"लेकिन पिछले महीने तक तो ये मुरझाए और बेजान से लग रहे थे"
"बेजान क्या, बस मरने ही वाले थे."
"तो क्या जादू कर दिया इन पर ?"
"घर के पिछवाड़े जो बड़ा सा पेड़ था वो पूरी धूप रोक लेता था,  उसे कटवाकर दफा किया, तब कहीं जाकर बेचारे केक्टस हरे हुए."

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by योगराज प्रभाकर on February 20, 2014 at 12:00pm — 40 Comments

मुख्यधारा (लघुकथा)

एक रात अचानक पुलिस वाले उसे उग्रवादी बता कर घर से उठा कर ले गए. क्या क्या ज़ुल्म नहीं किये गए थे उस पर. वह चीख चीख कर खुद को बेनुगाह बताता रहा लेकिन सब कुछ सुनते हुए भी सरकारी जल्लाद बहरे बने रहे. यातनाएं सहते सहते तक़रीबन छह महीने बीत गए थे. तभी एक दिन सरकार ने अपनी नई नीति के अनुसार उसे रिहा कर दिया ताकि वह भी राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल हो सके. उसके वापिस लौटने से घर में ख़ुशी का वातावरण था, लेकिन वह जड़वत बैठा न जाने कहाँ खोया रहता. वृद्ध पिता ने एक दिन उसके कंधे पर हाथ रखकर…

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Added by योगराज प्रभाकर on December 18, 2013 at 3:00pm — 38 Comments

श्रेय (लघुकथा)

"क्या? आपने धूम्रपान छोड़ दिया? ये तो आपने कमाल ही कर दिया।"
"आखिर इतनी पुरानी आदत को एकदम से छोड़ देना कोई मामूली बात तो नहीं।"
"सही कहा आपने, ये तो कभी सिगरेट बुझने ही नही देते थे।"
"जो भी है, इनकी दृढ इच्छा शक्ति की दाद देनी होगी।"
"इस आदत को छुड़वाने का श्रेय आखिर किस को जाता है?"
"भाभी को?"  
"गुरु जी को?"
"नहीं, मेरी रिटायरमेंट को।"उसने ठंडी सांस लेते हुए उत्तर दिया।
.
.
(मौलिक व अप्रकाशित) 

Added by योगराज प्रभाकर on December 2, 2013 at 4:00pm — 63 Comments

विषैला सत्य (लघुकथा)

"शादी के दस साल बाद भी ऐसी हरकत ?"

"……………"

"क्या ये सच है क़ि तेरे पेट में मालिक का बच्चा है ?"

"हाँ, ये बात बिलकुल सच है." 

"अरी छिनाल, लोगों को पता चलेगा तो वो क्या कहेंगे ?"


"और तो कुछ पता नहीं, लेकिन अब तुम्हे
कोई नामर्द नहीं…
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Added by योगराज प्रभाकर on November 9, 2013 at 12:00pm — 23 Comments

कन्या पक्ष (लघुकथा)

"डॉ साहिब, हमें बेटी नहीं चाहिए. आप बहू का एबॉर्शन कर दीजिए."
"ठीक है, आप लोग कल शाम मेरे प्राइवेट क्लिनिक पर आ जाईए".
"कल नहीं डॉ साहिब, हम लोग अगले हफ्ते ही आ पाएंगे"
"अगले हफ्ते क्यों ?"
"क्योंकि अभी नवरात्रे चल रहे हैं "

(मौलिक एवँ अप्रकाशित्)

Added by योगराज प्रभाकर on October 5, 2013 at 10:00am — 45 Comments

दिहाड़ीदार (लघुकथा)

"क्या ये खबर सही है कि एकाध दिन में दंगे शुरू होने वाले हैं ?"
"बिलकुल सही सुना भाई, खबर एकदम पक्की है." 
"तो फिर क्या प्रोग्राम बनाया ?"
"सोच रहा हूँ कि इस दफा उनकी पार्टी में शामिल हो जाऊं."

"अबे तेरा दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया ? बेगानों का साथ देकर अपनों से गद्दारी करेगा? 
"वो साले बेगाने ज़रूर हैं, लेकिन दिहाड़ी भी तो डबल देते हैं."

Added by योगराज प्रभाकर on August 26, 2013 at 10:30am — 37 Comments

शक्ति पूजा (लघुकथा)

गाँव की विधवाओं को सरकार की ओर से सहायता राशि वितरित की जा रही थी. तभी एक नौजवान विधवा अपने हिस्से की धनराशि लेने मंच की ओर बढ़ी, जिसे देख नेता जी ने सरपंच के कान में धीरे कहा,

"ये लड़की कौन है ?"

"
ये नंदू लुहार की बहू है नेता जी."

"अरे भई इसको तो बाकियों से ज्यादा पैसा मिलना चाहिए था."

"वो क्यों नेता…

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Added by योगराज प्रभाकर on October 10, 2012 at 10:00am — 34 Comments

शिल्पकार (लघुकथा)

जिस प्रकार के भवन की कल्पना बादशाह ने की थी यह भवन उससे भी कहीं अधिक सुन्दर बना था, जिसकी भव्यता देखकर बादशाह की आँखें चौंधिया सी गईं थीं. चहुँ ओर भवन निर्माण करने वाले शिल्पकार की मुक्तकंठ से प्रशंसा हो रही थी. जिसे सुनकर शिल्पकार भी फूला नहीं समा रहा था. लेकिन तभी अचानक बादशाह ने शिल्पकार के दोनों हाथ काट देने का आदेश दे दिया ताकि शिल्पकार पुन: ऐसी…

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Added by योगराज प्रभाकर on July 2, 2012 at 11:47am — 31 Comments

वर दक्षिणा (लघुकथा)

जब जब बेटी के ससुराल से फोन आता तो भार्गव जी अन्दर तक काँप उठते. दरअसल शादी के एकदम बाद दामाद ने नई कार देने की मांग रख दी थी. उसी वजह से कई बार बिटिया मायके आ भी चुकी थी. मामूली सी पेंशन पाने वाले भार्गव जी हर बार बिटिया को समझा बुझा कर वापिस भेज देते. लेकिन इस बार ससुराल का इतना दबाव था कि बिटिया समझाने पर भी नहीं मान रही थी और ज़िद पकड़ कर बैठ गई थी. भार्गव जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे करें तो क्या करें.



आखिर…
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Added by योगराज प्रभाकर on June 23, 2012 at 10:00am — 52 Comments

शतरंज (लघुकथा)

मजदूर दिवस पर विशेष 

.



मजदूर दिवस बहुत बड़ी ख़ुशी लेकर आया था. आज मजदूरों के सामने मालिकों को झुकना ही पड़ा था. अन्य सुविधायों के अतिरिक्त मजदूरों की रोजाना दिहाड़ी बढ़ा दी गई उन्हें ओवरटाईम तथा बढ़ा हुआ बोनस देने की घोषणा भी कर दी गई. मजदूर बस्ती में हर तरफ ख़ुशी का माहौल था, अपनी मांगें पूरी होने की ख़ुशी में जहाँ मजदूर मंदिरों जाकर भगवान को धन्यवाद दे रहे थे, वहीँ दूसरी तरफ मजदूर यूनियन के कुछ नेता मालिकों के घर दावत उड़ा रहे थे, क्योंकि एक बात मजदूरों से…

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Added by योगराज प्रभाकर on May 1, 2012 at 10:15am — 21 Comments

आतंकवाद (लघुकथा)

आखिर पुलिस ने उस दुर्दांत आतंकवादी को मार गिराया, उसे मार गिराने वाले पुलिस अफ़सर की बहादुरी की भूरि भूरि प्रशंसा हो रही थी तथा उसके लिए बड़े बड़े सम्मान देने की घोषणाएं भी हो रहीं थी. मीडिया का एक बड़ा दल भी आज उसका साक्षात्कार लेने आ रहा था. इसी सिलसिले में वह बहादुर अफ़सर तैयारियों का जायजा लेने पहुँचा.



"सब तैयारियां हो गईं?" उसने एक अधीनस्थ से पूछा

"जी सर !"

"क्या किसी ने लाश की शिनाख्त की:"

"नहीं सर, चेहरा इतनी बुरी तरह से…

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Added by योगराज प्रभाकर on April 26, 2012 at 12:13pm — 39 Comments

छन्न पकैयावली

छन्न पकैया-छन्न पकैया,छन्न के ऊपर बिंदी

भाषायों की पटरानी है, अपनी माता हिंदी.(१)

.

छन्न पकैया-छन्न पकैया, बात नहीं ये छोटी

भरे देश के जो भंडारे, उसको दुर्लभ रोटी. (२)

.

छन्न पकैया-छन्न पकैया, छन्न पके की हंडिया

भारत जिंदा रहा अगर जो, तभी बचेगा इंडिया. (३)

.

छन्न पकैया-छन्न पकैया, कैसा गोरख…
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Added by योगराज प्रभाकर on December 21, 2011 at 7:03pm — 12 Comments

5 कह मुकरियाँ

(१)

मेरा दिल वो मेरी धड़कन,

उसपे कुरबां मेरा जीवन !

मेरी दौलत मेरी चाहत

ऐ सखी साजन ? न सखी भारत !

---------------------------------------

(२)

अंग अंग में मस्ती भर दे

आलिम को दीवाना कर दे

महका देता है वो तन मन 

ऐ सखी साजन ? न सखी यौवन  !

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(३)

मिले न गर, दुनिया रुक जाए

मिले तो जियरा खूब जलाए ! 

हो कैसा भी - है अनमोल,

ऐ सखी साजन ? न सखी पट्रोल…

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Added by योगराज प्रभाकर on September 21, 2011 at 4:30pm — 59 Comments

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