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ज़िंदा हूँ मगर जीने का एहसास नही है

इक उसके चले जाने से कुछ पास नही है

ज़िंदा हूँ मगर जीने का एहसास नही है



वो दूर गया जब से ये बेजान है महफिल

साग़र है सुराही हैं मगर प्यास नही है



सुनने को तिरे पास भी जब वक़्त नही तो

कहने को मिरे पास भी कुछ ख़ास नहीं है

 

इस रूह के आगोश में है तेरी मुहब्बत

माना के तिरा प्यार मिरे पास नही है



रावण तो ज़माने में अभी ज़िंदा रहेगा

क़िस्मत में अभी राम के बनवास नही है



फिर कैसे यक़ी तुझपे करेगा ये ज़माना,

ख़ुद तुझको…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on March 18, 2014 at 11:30pm — 21 Comments

ग़ज़ल- रात इक जुगनू हवा में कुलबुलाता रह गया

रात इक जुगनू हवा में कुलबुलाता रह गया

रौशनी के वास्ते खुद को जलाता रह गया



पेट की मजबूरियां थीं, हम शहर में बस गए

गाँव हमको ख्वाब में वापस बुलाता रह गया



कोठियाँ बेशक मेरे बच्चों ने कर दी हैं खड़ी

पर तुम्हारी याद का उसमें अहाता रह गया



आज मुझको काम से इक रोज की फुर्सत मिली

आज दिनभर लाडला बस मुस्कुराता रह गया



धन की देवी आपके घर क्यों कभी रुकती नहीं

चौक पर बैठा नजूमी ये बताता रह गया



आँख का हर प्रश्न आंसू की सतह में बह… Continue

Added by Anurag Anubhav on March 14, 2014 at 10:59pm — 25 Comments

चलो यूँ ही समझा लें मन को …

मैं गिड़गिड़ाता रहा हूँ

रात दिन

तुम सबके सामने

जितने भी सम्बन्ध हो

कल आज और कल के

इस उम्मीद के साथ /कि

तुम थोड़ा पिघलोगे

भले ही अनिच्छा से

मेरा मान रखोगे

यह भ्रम /जीवन भर

साथ चलता रहा है

इसीलिये सब सहा है

यह सुनते ही तुम

मेरे विरोध में

खड़े हो जाओगे

और शायद फिर

मुझे गिड़गिड़ाता पाओगे

मैं अपना वक्तव्य बदलता हूँ

और इसे सार्वभौम /करता हूँ

फिर तुम्हारी और अपनी

ओर से कहता हूँ

मैं

मुझे…

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Added by dr lalit mohan pant on March 9, 2014 at 10:23pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हे माँ श्वेता शारदे , सरस्वती वन्दना (उल्लाला छंद पर आधारित )

सरस्वती वंदना  (उल्लाला छंद पर आधारित )

हे माँ श्वेता शारदे , विद्या का उपहार दे

श्रद्धानत हूँ प्यार दे , मति नभ को विस्तार दे

तू विद्या की खान है ,जीवन का अभिमान है

भाषा का सम्मान है ,ज्योतिर्मय वरदान है

नव शब्दों को रूप दे ,सदा ज्ञान की धूप दे

हे माँ श्वेता शारदे ,विद्या का उपहार दे

कमलं पुष्प विराजती ,धवलं वस्त्रं  शोभती

वीणा कर में साजती ,धुन आलौकिक…

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Added by rajesh kumari on February 28, 2014 at 3:54pm — 13 Comments

कुछ कह मुकरियां

१. लगे अंग तो तन महकाए,

जी  भर देखूं  जी में आये,

कभी कभी पर  चुभाये शूल,

का सखी साजन ? ना सखी फूल.

 

 

२. गोदी में सर रख कर सोऊँ,

मीठे मीठे ख्वाब में खोऊँ,

अंक में लूँ, लगाऊं छतिया.

का सखी साजन? ना सखी तकिया .

 

 

३ उससे डर, हर कोई भागे,

बार बार वह लिख कर माँगे.

कहे देकर फिर करो रिलैक्स.

का सखी साजन? ना सखी टैक्स ..

 

४. गाँठ खुले तो इत उत डोले,

जिधर हवा उधर ही हो…

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Added by Neeraj Neer on February 28, 2014 at 8:00pm — 31 Comments

ग़ज़ल..........बृजेश

2122       2122       212 

फाइलातुन   फाइलातुन   फाइलुन

(बहरे रमल मुसद्दस महजूफ)

वृत्ति जग की क्लिष्ट सी होने लगी

सोच सारी लिजलिजी होने लगी

भीड़ है पर सब अकेले दिख रहे 

भावनाओं में कमी होने लगी

चाहना में बजबजाती देह भर 

व्यंजना यूँ प्रेम की होने लगी

धर्म के जब मायने बदले गए 

नीति सारी आसुरी होने लगी

सूखती…

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Added by बृजेश नीरज on February 28, 2014 at 10:31pm — 54 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
कुछ कह-मुकरियाँ ..............डॉ० प्राची

क़दमों में दे बहकी थिरकन

महकी नम सी चंचल सिहरन  

बाँहों भर ले, रच कर साजिश 

क्या सखि साजन? न सखि बारिश 

हर पल उसने साथ निभाया 

संग चले बन कर हम साया 

रंग रसिक नें उमर लजाई 

क्या सखि साजन? न सखि डाई

चाहे मीठे चाहे खारे 

राज़ पता हैं उसको सारे 

खोल न डाले राज़, हाय री ! 

क्या सखि साजन? न सखि डायरी 

उसने सारे बंध…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 21, 2014 at 6:00pm — 44 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
शिव का दृढ़ विश्वास मिले अब (नवगीत) // --सौरभ

उमा-उमा मन की पुलकन है

शिव का दृढ़ विश्वास

मिले अब !



सूक्ष्म तरंगों में

सिहरन की

धार निराली प्राणपगी है  

शैलसुता तब

क्लिष्ट मौन थी  …

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Added by Saurabh Pandey on February 7, 2014 at 6:30pm — 44 Comments

कह मुकरियाँ (कल्पना रामानी)

इस विधा में मेरा प्रथम प्रयास(1से 10)

1)

रखती उसको अंग लगाकर।

चलती उसके संग लजाकर।

लगे सहज उसका अपनापन।

क्या सखि, साजन?

ना सखि, दामन!

 2)

दिन में तो वो खूब तपाए।

रात कभी भी पास न आए।

फिर भी खुश होती हूँ मिलकर।

क्या सखि साजन?

ना सखि, दिनकर!

 3)

वो अपनी मनमानी करता।

कुछ माँगूँ तो कान न धरता।

कठपुतली सा नाच नचाता।

क्या सखि साजन?

नहीं, विधाता!

 4)…

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Added by कल्पना रामानी on February 11, 2014 at 10:30am — 38 Comments

भावों के विहंगम

तेरे फड़फड़ाते पंखों की छुअन से

ऐ परिंदे!

हिलोर आ जाती है

स्थिर,अमूर्त सैलाब में

और...

छलक जाता है 

चर्म-चक्षुओं के किनारों से

अनायास ही कुछ नीर.

हवा दे जाते हैं कभी

ये पर तुम्हारे

आनन्द के उत्साह-रंजित

ओजमय अंगार को,

उतर आती है

मद्धम सी चमक अधरोष्ठ तक,

अमृत की तरह.

विखरते हैं जब

सम्वेदना के सुकोमल फूल से पराग,

तेरे आ बैठने…

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Added by Vindu Babu on February 9, 2014 at 2:00pm — 32 Comments

बसंत के दोहे : अरुन अनन्त

बदला है वातावरण, निकट शरद का अंत ।

शुक्ल पंचमी माघ की, लाये साथ बसंत ।१।



अनुपम मनमोहक छटा, मनभावन अंदाज ।

ह्रदय प्रेम से लूटने, आये हैं ऋतुराज ।२।



धरती का सुन्दर खिला, दुल्हन जैसा रूप ।

इस मौसम में देह को, शीतल लगती धूप ।३।



डाली डाली पेड़ की, डाल नया परिधान ।

आकर्षित मन को करे, फूलों की मुस्कान ।४।



पीली साड़ी डालकर, सरसों खेले फाग ।

मधुर मधुर आवाज में, कोयल गाये राग ।५।



गेहूँ की बाली मगन, इठलाये अत्यंत ।…

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Added by अरुन 'अनन्त' on February 3, 2014 at 12:00pm — 29 Comments

स्वागत तव ऋतुराज

ऋतुराज के स्वागत में पांच दोहे



स्वागत तव ऋतुराज



चंप पुष्प कटि मेखला, संग सुभग कचनार।

गेंदा बिछुआ सा फबे, गल जूही का हार।१।

.

बेला बाजूबंद सा, कंगन हरसिंगार।

गुलमोहर भर मांग में, करे सखी श्रृंगार ।२।

.

पहन चमेली मुद्रिका, नथिया सदाबहार।

गुडहल बिंदी भाल दे, मन मोहे गुलनार।३।

.

जूही गजरा केवडा, सजे सखिन के बाल।

तन मन को महका रही, मौलश्री की माल।४।

.

झुमका लटके कान में, अमलतास का आज।

इस अनुपम श्रृंगार…

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Added by Satyanarayan Singh on February 3, 2014 at 5:30pm — 23 Comments

नवगीत--(उदासी गर्इ भौंरा फिर गुनगुनाया)

हॅसी रूप कलियों का जब मुस्कुराया,

उदासी गर्इ भौंरा फिर गुनगुनाया।।

बहारों की रानी,

राजनीति पुरानी।

नर्इ-नर्इ कहानी,

जवानी-दीवानी।

महगार्इ बढ़ाकर,

नववधू घर आती।

दिशाएं भी छलती,

गरीबी की थाती।

अमीरों का राजा, अल्ला-राम आया।। 1

सजाते हैं संसद,

समां बर्रा छत्ता।

परागों को जन से,

चुराती है सत्ता।

अगर रोग-दु:ख में,

पुकारे भी जनता।

शहर को जलाकर,

कमाते हैं भत्ता।

चुनावों…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 3, 2014 at 10:30pm — 14 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
अनकही बातें...(नवगीत) - डॉ० प्राची

अनकही बातें धड़कतीं

मुस्कुराती

पल रही हैं.

 

थाम यादों की उँगलियाँ

स्वप्न जो

गुपचुप सजाये

शब्द आँखों में उफनते

क्या हुआ जो

खुल न पाये

 

भाव लहरें

तलहटी में

व्यक्त हो अविरल बही हैं.

 

रच गए जब

स्वप्न पट पर

नेह गाथा चित चितेरे

रंग फागुन से चुरा कर

कल्पनाओं में बिखेरे...

 

श्वास में

घुल कर बहीं जो

वो हवाएँ निस्पृही…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 4, 2014 at 9:30am — 23 Comments

नदी माँ है

पर्वत की तुंग

शिराओं से

बहती है टकराती,

शूलों से शिलाओं से,

तीव्र वेग से अवतरित होती,

मनुज मिलन की

उत्कंठा से,

ज्यों चला वाण

धनुर्धर की

तनी हुई प्रत्यंचा से.

आकर मैदानों में

शील करती धारण

ज्यों व्याहता करती हो

मर्यादा का पालन.

जीवन देने की चाह

अथाह.

प्यास बुझाती

बढती राह.

शीतल, स्वच्छ ,

निर्मल जल

बढ़ती जाती

करती कल कल

उतरती नदी

भूतल समतल

लेकर ध्येय जीवनदायी

अमिय भरे

अपने…

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Added by Neeraj Neer on January 28, 2014 at 10:04am — 36 Comments

गर्वीला पुष्प (अन्नपूर्णा बाजपेई)

शाख पर लगा 

अलौकिक सौंदर्य पर इतराता 

वसुधा को मुंह चिढ़ाता 

मुसकुराता इठलाता 

मस्त बयार मे कुलांचे भरता 

गर्वीला पुष्प !.......... 

सहसा !!!

कपि अनुकंपा से 

धराशायी हुआ 

कण कण बिखरा 

अस्तित्व ढूँढता 

उसी धरा पर 

भटकता यहाँ से वहाँ 

उसी वसुधा की गोद मे समा जाने को आतुर ... 

बेचारा पुष्प !!! 

अप्रकाशित एवं मौलिक 

Added by annapurna bajpai on January 25, 2014 at 10:30am — 21 Comments

ग़ज़ल - छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या

छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या

इल्म लेगा ये इम्तेहान भी क्या



ख़ुद से कर देगा बदगुमान भी क्या 

कोई ठहरेगा मेह्रबान भी क्या



है मुकद्दर में कुछ उड़ान भी क्या

इस ज़मीं पर है आसमान भी क्या

मेरा लहजा ज़रा सा तल्ख़ जो है

काट ली जायेगी ज़बान भी क्या

धूप से लुट चुके मुसाफ़िर को

लूट लेंगे ये सायबान भी क्या



इस क़दर जीतने की बेचैनी

दाँव पर लग चुकी है जान भी क्या



अब के दावा जो है मुहब्बत का

झूठ ठहरेगा ये…

Continue

Added by वीनस केसरी on January 20, 2014 at 12:30am — 26 Comments

साथी! तोड़ न मेरे पात...

साथी! तोड़ न निर्दयता से चुन चुन मेरे पात...



नन्हीं एक लता मैं  निर्बल,

मेरे पास न पुष्प न परिमल,

मेरा सञ्चित कोष यही बस,

कुछ पत्ते कुम्हलाये कोमल,

तोड़ न दे यह शाख अकिञ्चन, निर्मम तीव्र प्रवात...



मैं हर भोर खिलूँ मुस्काती,

पर सन्ध्या आकुलता लाती,

साँस साँस भारी गिन गिन मैं,

रजनी का हर पहर बिताती,

एक नये उज्ज्वल दिन की आशा, मेरी हर रात...



पड़ती तेरी ज्वलित दृष्टि जब,

भीत प्राण भी हो जाते तब,

सहमी सकुचायी मैं…

Continue

Added by अजय कुमार सिंह on January 22, 2014 at 3:30pm — 20 Comments

मैं कौन हूँ .....

किसको पता कि कौन हूँ मैं ....

कोई शब्द नहीं निःशब्द हूँ मैं ....

खुद के चित्कार में छुप जाता हूँ

मेरा अस्तित्व,

मेरी संवेदनाएं

सन्नाटों ने खूब पढ़ा है

मेरे अनकहे शब्दों को

और ठंडी चुभती सर्द हवाओं ने

महसूस करा है ....

मेरे शब्दों के एहसास को .....

बहुत कुछ कहता हूँ

दिन भर .... 

तुमसे, सबसे

पर सच कहूँ तो 

आज तक

मैं, सिर्फ निःशब्द हूँ .....

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Amod Kumar Srivastava on January 9, 2014 at 10:49pm — 20 Comments

ग़ज़ल (ज़िंदगी के यज्ञ में खुद को हवन करना पड़ा)

ज़िंदगी के यज्ञ में खुद को हवन करना पड़ा 

आंसुओं से ज़िंदगीभर आचमन करना पड़ा....



मंज़िलों से दूरियाँ जब ,कम नहीं होती दिखीं 

क्या कमी थी कोशिशों में,आंकलन करना पड़ा .....



ऐसे ही पायी नहीं थी देश ने स्वतन्त्रता 

इस को पाने के लिए क्या क्या जतन करना पड़ा ...



जाने मुंसिफ़ की भला थी कौन सी मजबूरियां 

फैसला हक़ में मेरे जो दफ़अतन करना…

Continue

Added by Ajay Agyat on January 11, 2014 at 7:00pm — 16 Comments

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