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बेबसी (कहानी)

            श्याम खुद को बहुत खुशकिस्मत मान रहा था | बात थी भी ऐसी, वो भयानक रात और दो दिन तक मची तबाही का मंजर एक पल के लिए भी तो उसकी आँखों से नहीं हटा था | जहाँ-तहां लाशे बिछी हुई थी और हर तरफ चीख पुकार |

श्याम अपनी पत्नी सुनीता चार बच्चो का पेट पालने के लिए एक खच्चर के सहारे खच्चर में माल ढोने का काम करता है और हर साल यात्रा सीजन में केदारनाथ परिवार सहित केदार बाबा की शरण में पहुँच जाता था | जहाँ पत्नी फूल प्रसाद बेचा करती है, और बच्चे होटल में बर्तन धोने का का काम और वो खुद खच्चर…

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Added by दिव्या on July 31, 2013 at 4:29pm — 7 Comments

तुम मेरी कौन हो

अनंत मनोभाव जब,

शब्द से क्यों मौन हो ?

तुम मेरी कौन हो ?

 

किंचित मुझे भी ज्ञान है,

किंचित जो तुमसे ज्ञात हो,

अनुत्तरित सा प्रश्न ये,

उत्तरित हो जाय, कि

आभास से समीपता,

पर दृष्टि से क्यों गौण हो ?

 

लगता मुझे कि ब्रह्म-सी,

नेत्र-शक्ति से परे,

अनुभवीय मात्र हो !

आत्मदर्शनीय, किन्तु

बाह्य हींन गात्र हो !

 

सत्य क्या ? पता नही,

किन्तु, कुछ अनुमान है…

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Added by पीयूष द्विवेदी भारत on July 31, 2013 at 4:04pm — 4 Comments

गरीब की भूख

आज सुबह मेरे दोस्त ने मुझे फोन किया  और कहा की आज एक विषय पर कहानी लिखो -गरीब की भूख , मुझे थोड़ी हैरानी हुयी, "ये क्या ! आज ये क्या विषय दे दिया 'गरीब की भूख ', ये तो निबन्ध लिखने का विषय है, इस पर कहानी कैसे लिखी जा सकती है "...थोडा विरोध था मन में, मगर जाने क्या हुआ, मैंने सोचा "चलो रहने देते है, देखते है, आज अपनी प्रतिभा को भी आजमाते है .... 
.
उसके बाद मैं अपने कार्यालय के लिये चल पड़ा, मगर आज मन बेचैन था, आखिर गरीब की भूख पर कोई कहानी…
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Added by Sumit Naithani on July 31, 2013 at 4:00pm — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ४० (ओ मेरी नायिका)

ओ मेरी नायिका

-------------------

मोहिनी अदाएं,

मारक निगाहें,

कामिनी काया...

गजगामिनी, ऐश्वर्या,

गर्विता, हंसिनी,

हिरणी, सुगंधिता,

रमणी, अलंकृता,

मंजरी, प्रगल्भा, ....

क्या क्या कहूं तुझे.

 

मेरे प्रेम भाव का अवलम्ब,

अपने सौन्दर्य और यौवन से

मुझमें रति भाव जगाने वाली,

और अपनी अनुपस्थिति में

नित प्रतिदिन के कामों से विमुख कर

अपनी ही स्मृतियों के कानन में

मुझे…

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Added by राज़ नवादवी on July 31, 2013 at 3:32pm — No Comments

महिमा पैसो की

महिमा पैसो की

******************************

पर पैसो के मैने तो देखे नही ।

फिर क्यू वो कही पे ठहरता नही ॥

पकडते है दोनो हाथो से सभी ।

पर पकड मे किसी के वो आता नही ॥......... फिर क्यू वो कही पे ठहरता नही ॥…

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Added by बसंत नेमा on July 31, 2013 at 3:30pm — 2 Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने-५३ (स्लौटर हाउस)

रात के ग्यारह बजे मैं और मेरे दोस्त रदीफ़ भाई भोपाल से दिल्ली एअरपोर्ट पहुंचे! रदीफ़ भाई को जो रोज़े पे थे कल सुबह ‘सहरी’ करनी थी सो लिहाज़ा हम पहाड़गंज के एक ऐसे होटल में रुके जहाँ सुबह के तीन बजे खाना मिल सके. होटल पहुंचते- पहुंचते रात के बारह से ज़्यादा बज गए. सामान कमरे में रख मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की और चल पड़ा जो पास ही था- अपने कॉलेज के दिनों की कुछ यादों से गर्द झाड़ता हुआ. कुछ भी क्या बदला था- वही ढाबों की लम्बी कतार, जगह-जगह उलटे लटके तंदूरी चिकन की झालरें, तो कहीं शुद्ध…

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Added by राज़ नवादवी on July 31, 2013 at 9:26am — 2 Comments

ग़ज़ल : अरुन शर्मा 'अनन्त'

उमर भर साथ तू शामिल रही परछाइयों में,

सहा जाता नहीं है दर्द-ए-दिल तन्हाइयों में,

जरा सी बात पे रिश्ता दिलों का तोड़ते हैं,

उतर पाते नहीं जो प्यार की गहराइयों में,

भला इन्सान कोई दूर तक दिखता नहीं है,

बुराई घुल रही तेजी से है अच्छाइयों में,

जमीं ही रोज जीवनदान देती है सभी को,

जमीं ही रार बोती है सगे दो भाइयों में,

निगाहों को दिखाकर ख्वाब ऊँचें आसमां का,

गिराते लोग हैं धोखे से गहरी खाइयों…

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Added by अरुन 'अनन्त' on July 30, 2013 at 8:30pm — 22 Comments

शब्दों के पंछी

शब्दों के घेरे

 घेर लेते है मुझे

किसी चिड़िया की

मानिंद आ बैठते हैं

हृदय रूपी वृक्ष द्वार पर  

कल्पनाओं की टहनी पर

फुदक फुदक कर

बनाते है नई रचनाये

गीत कवित्त कविताएं

कल्पनाओं की उड़ान

को देते हैं हर बार

नए पंख लगा बैठते  

हर बार टहनी टहनी

मेरे नए जीवन की

हर सुबह को देते

एक सूरज नया । ............ अन्न्पूर्णा बाजपेई

 

मौलिक एवं अप्रकाशित  

Added by annapurna bajpai on July 30, 2013 at 2:00pm — 11 Comments

हर तरफ जंग की तस्वीर नई होती है॥

जब कभी अम्न की तदबीर नई होती है॥

हर तरफ जंग की तस्वीर नई होती है॥

ख़त्म कर देती है सदियों की पुरानी रंजिश,

वक़्त के हाथ में शमशीर नई होती है॥

पहले होते हैं यहाँ क़त्ल धमाके…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on July 30, 2013 at 1:37am — 8 Comments

कभी यूँही......

वास्ता बस यूँ कि

यादें आती रहें जाती रहें

इसी बहाने कभी यूँही कह

मुस्कुरा लिया करेंगे

गुज़रती बेहाल सी

रफ़्तार भरी ज़िन्दगी में भी

इसी बहाने कभी यूँही कह

दो घड़ी थम जाया करेंगे

दुखती आँखों पर भी

थोड़ा रहम हो जायेगा

इसी बहाने कभी यूँही कह

आंखे मूंद तुम्हें

देख लिया करेंगे

खोलती नहीं दुपट्टे की

वो गांठ चुभती है जो

ओढ़ने में….इसी बहाने

कभी यूँही कह तुम्हें

महसूस कर लिया…

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Added by Priyanka singh on July 29, 2013 at 10:50pm — 15 Comments

प्रेम के कवित्त - (रवि प्रकाश)

1.धार तू,मझधार तू,सफ़र तू ही,राह तू,

घाव तू,उपचार तू,तीर भी,शमशीर भी।

जाने कितने वेश है,दर्द कितने शेष हैं,

गा चुके दरवेश हैं,संत ,मुर्शिद,पीर भी।

ध्वंस किन्तु सृजन भी,भीड़ तू ही,विजन भी,

छंद है स्वच्छन्द किन्तु,गिरह भी,ज़ंजीर भी।

भाग्य से जिसको मिला,उसे भी रहता गिला,

पा तुझे बौरा गए,हाय,आलमगीर भी॥

 

 

2.डूब चले थे जिनमें,उनसे ही पार चले,

जिनमें थे हार चले,वो पल ही जीत बने।

कितने साँचों में ढले,सारे संकेत तुम्हारे,

कुछ ग़ज़लों…

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Added by Ravi Prakash on July 29, 2013 at 8:00am — 9 Comments

"स्पंदन "

बेजान कमरे में

टूटी खटिया पे लेटा

करवट लेते हुए

आँखों के पूरे सूनेपन के साथ

कभी कभी खिड़की के

बाहर देखता हूँ

कैसी है दुनियां

क्या वैसी ही है

जैसी पहले हुआ करती थी

दर्द के समंदर में

निस्पंद जड़ सा

सोचता रहा

अपने ही अपने नहीं रहे

ये गुमशुदी का जीवन कब तक

एक चिंता जाती

तो दूसरी उत्पन्न

देखता रहता हूँ

सजीव कंकाल सा

इधर उधर

बस जिंदा हूँ

औपचारिक

राम शिरोमणि…

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Added by ram shiromani pathak on July 28, 2013 at 8:00pm — 16 Comments

क्या पता सावन भी किसी के लिए रोता होगा

देख कर सावन को

आँखे भर आती हैं

क्या पता सावन भी

किसी की याद मे रोता होगा

मेरी ही तरह करता होगा

इंतज़ार किसी का ….

टूट जाने पर वादा

मेरी ही तरह रोता होगा

क्या पता सावन भी

सावन में किसी के लिए

तरसता होगा ………

करके वादा गया होगा कोई

लौट कर आऊंगा उस महीने में

जिसमे बरसात होगी ……

ऐ मेरे चाहने वाले

अब तो तुमसे

बरसात में ही मुलाक़ात होगी

टूटता होगा वादा तो

दिल भी टूट जाता होगा

दर्द के…

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Added by Sonam Saini on July 28, 2013 at 11:30am — 7 Comments

साँझ से संवाद

नव निशा की बेला लेकर,

साँझ सलोनी जब घर आयी।

पूछा मैंने उससे क्यों तू ,

यह अँधियारा संग है लायी॥

सुंदर प्रकाश था धरा पर,

आलोकित थे सब दिग-दिगंत।

है प्रकाश विकास का वाहक,

क्यों करती तू इसका अंत॥

जीवन का नियम यही है,

उसने हँसकर मुझे बताया।

यदि प्रकाश के बाद न आए,

गहन तम की काली छाया॥

तो तुम कैसे जान सकोगे,

क्या महत्व होता प्रकाश का।

यदि विनाश न हो भू पर,

तो कैसे हो…

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Added by Pradeep Bahuguna Darpan on July 28, 2013 at 11:00am — 6 Comments

कविता : बादल, सागर और पहाड़ बनाम पूँजीपति

बादल

 

बादल अंधे और बहरे होते हैं

बादल नहीं देख पाते रेगिस्तान का तड़पना

बादलों को नहीं सुनाई पड़ती बाढ़ में बहते इंसानों की चीख

बादल नहीं बोल पाते सांत्वना के दो शब्द

बादल सिर्फ़ गरजना जानते हैं

और ये बरसते तभी हैं जब मजबूर हो जाते हैं

 

सागर

 

गागर, घड़ा, ताल, झील

नहर, नदी, दरिया

यहाँ तक कि नाले भी

लुटाने लगते हैं पानी जब वो भर जाते हैं

पर समुद्र भरने के बाद भी चुपचाप पीता…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 27, 2013 at 10:00pm — 5 Comments

बहुत दिन बाद आए

नीरज, बहुत दिन बाद आए

जेठ में भी

बादल दिख गए

पर तुम नहीं दिखे

 

हमारा साथ कितना पुराना

जब पहली बार मिले थे

तभी लगा था

पिछले जनम का साथ

करम लेखा की तरह

अनचीन्हा नहीं था

 

तुम्हारे न रहने पर

बहुत अकेला होता हूँ

किसी के पास

समय नहीं

समय क्या

कुछ भी नहीं

दूसरों के लिए

दिन काटे नहीं कटता

 

तुम नहीं थे

मैं जाता था बतियाने

पेड़…

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Added by बृजेश नीरज on July 27, 2013 at 8:30pm — 18 Comments

सावन है अति पावन | वीर छंद |

जब घिर बदरा  रिम झिम बरसे  , तब दादुर नाचे बन  मोर |
पवन बहे जब झूम झूम के , तब घासें झूमें झकझोर  |
चाँद छुप छुपआये गगन में , जनु   चाँदनी छुपे हर ओर | 
आया है मन भावन सावन , सब कजरी गावें चहुओर | 
डाली झूम जनु  गुनगुनायें , कोयल भी गाये दिल…
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Added by Shyam Narain Verma on July 27, 2013 at 5:30pm — 5 Comments

मन तक आना शेष रहा - (रवि प्रकाश)

मैंने बस धीरज माँगा था,तुमने ही अधिकार दिया;

कितने पत्थर रोज़ तराशे,फिर मुझको आकार दिया।

बादल,बरखा,बिजली,बूँदें,क्या कुछ मुझमें पाया था;

पथ-भूले को इक दिन तुमने,दिग्दर्शक बतलाया था।

लेकिन मेरे पथ पर चलना,श्रद्धा लाना शेष रहा।

धड़कन के दरबान बने तुम,मन तक आना शेष रहा॥

आशा को थकन नहीं होती,इच्छा को विश्राम कहाँ;

जब तक साँसों में उष्मा है,जीवन को आराम कहाँ।

कण-कण जमते हिमनद में भी,बाक़ी रहता ताप कहीं;

मनभावन आलिंगन में भी,छू जाता संताप…

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Added by Ravi Prakash on July 27, 2013 at 5:30pm — 7 Comments

जिंदगी दूर तक !

सम्मानीय सादर नमन !!

 मेरी पहली पोस्ट आप सब के हवाले
 ************************************
जिंदगी दूर तक !
तीरगी दूर तक !!
 
दिखती अब नहीं ,
रौशनी दूर तक !!
 
आँखों में ख्वाब थे ,
है नमी दूर तक !!
 
ले के आयी हमें ,
तिश्नगी दूर तक !!
 
मैं गलत ही सही ,
तू सही दूर तक !!
 
लुत्फ़ देने लगी…
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Added by arvind ambar on July 27, 2013 at 8:30am — 9 Comments

दो शब्द (राम शिरोमणि पाठक)

१-सहनशीलता

उत्पीडन की क्रीडा से उत्पन्न श्रान्ति से

पिंग बने टहल रहे

अकारण ही रंज रुपी हरिका खे रहे

मोषक को पोषक कहते

वाह!सहनशीलता की पराकाष्ठा

शायद!

खुद को काकोदर के मुख में फसा

मंडूक मान बैठे है

२-लिखता रहा

हृदयतल के तड़ाग से

अनकहे शब्द

अकुलाहट के साथ

बुलबुले बन

निकलते रहे निकलते रहे

पीड़ा है क्या ? नहीं तो

प्रेम है

विरह है

पता नहीं

फिर भी मै …

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Added by ram shiromani pathak on July 26, 2013 at 8:30pm — 20 Comments

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