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श्रम चोर

उषा अवस्थी

सुबह सबेरे थैलियाँ लेकर निकलें आप

तोड़ पुष्प झोली भरें प्रभु-पूजा के काज

भगवन भूखे भाव के, न जानें यह मर्म

दूजों के श्रम की करें चोरी, नित्य अधर्म

माली से ले आज्ञा, गुरु के हित, सुखधाम

फुलवारी में जनक की, फूल चुने तब राम

मन्दिर में प्रभु को प्रसन्न करने के हित,भोर

गलियों - गलियों डोलते हैं प्रसून के चोर

पाले, पोसे , सींच कर बड़ा करे कोई और

नष्ट करें शाखाओं को खींच-खींच…

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Added by Usha Awasthi on April 13, 2023 at 5:58pm — 2 Comments

ग़ज़ल 'नूर' की - कोई हुस्न-परस्त जो अपने रब की बातें करता है

कोई हुस्न-परस्त जो अपने रब की बातें करता है

तिल की बातें करता है या लब की बातें करता है.

.

दिल तो फिर भी धड़कन धड़कन सब की बातें करता है

ज़ह’न है साहूकार फ़क़त मतलब की बातें करता है.

.

लड़ते लड़ते दुश्मन से भी हो जाता है इश्क़ अजब

जुगनू भी अक्सर दीये से शब् की बातें करता है.

.

इक मुद्दत से यार! चलन से बाहर है ये लफ़्ज़-ए-वफ़ा  

दिल नादान मुअर्रिख़ जैसा; कब की बातें करता है.                         मुअर्रिख़- इतिहास-कार…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 13, 2023 at 4:00pm — 6 Comments

क़िस्मत के मेरे पन्ने ही कोरे निकल गए (ग़ज़ल)

दिल में जो मेरे ख़्वाब मुहब्बत के पल गए

इस ज़िन्दगी के सारे मआनी बदल गए

ग़ैरों में इतना दम कहाँ था मात दे सकें 

अपने समर के बीच विभीषण निकल गए 

आहों का मेरी उन प नहीं कुछ असर हुआ

सुन कर मगर उसे कई पत्थर पिघल गए

उसकी जुदाई में मेरी हालत को देख कर

यमराज के भी भेजे फ़रिश्ते दहल गए

दावा था जिनका साथ निभाएँगे उम्र भर

ग़ुर्बत में जीता देख के रस्ते बदल गए 

उसको मैं बेवफ़ाई का दूँ दोष किस…

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Added by Ajay Kumar on April 11, 2023 at 8:48pm — No Comments

कुछ कर न सका

वो मुझसे दूर होती गई

और मैं देख्ता रहा चुपचाप

कुछ कर न सका

दुख की सीमा मत पूंछो

कितना कम्मपित था हृदय अरे

मन भीषण सन्ताप से पीडित था

कुछ कर न सका

कुछ कर न सका हे नाथ

वो मुझसे दूर होती गई

और मैं देख्ता रहा चुपचाप

मानव हृदय भी कैसा है

कुछ सोच रहा कुछ होता है

मानव हृदय भी कैसा है

कुछ सोच रहा कुछ होता है

बस में इसके कुछ भी तो नहीं

बस पडा पडा ये रोता है

वो दूर गई जाती ही रही…

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Added by DR ARUN KUMAR SHASTRI on April 10, 2023 at 1:30am — No Comments

दोहा मुक्तक .....

दोहा मुक्तक 

नाम बदलने से कहाँ , खुलें भाग्य के द्वार ।

बिना  कर्म  संसार  में, कब  होता  उद्धार ।

जब तक चलती जिन्दगी, चले जीव संग्राम -

जीवन के हर मोड़ का, हार  जीत  शृंगार ।

                         ***

काहे  अपने  रूप  पर, करता  जीव गुमान ।

कहते   हैं   रहती  नहीं, उम्र  ढले  पहचान ।

बुझ कर भी बुझती नहीं, अरमानों की आँच -

मुट्ठी   भर    की   जिंदगी, तेरी  है   इंसान ।

सुशील सरना /

मौलिक एवं…

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Added by Sushil Sarna on April 5, 2023 at 1:01pm — 2 Comments

(ग़ज़ल) जो सच का पैरोकार नहीं

22     22     22     22

 

जो सच का पैरोकार नहीं 

वो काग़ज़ है अख़बार नहीं 

 

बेशक मैं गुल का हार नहीं

पर नफ़रत का भण्डार नहीं 

 …

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Added by Ajay Kumar on April 4, 2023 at 9:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल( यहाँ की बात वहाँ ला के जोड़ देते हैं)

1212 1122 1212 22

ये न्यूज़ वाले कहानी को मोड़ देते हैं

यहाँ की बात वहाँ ला के जोड़ देते हैं

ख़राब आज को करते नहीं हैं उसके लिए

जो कल की बात है कल पे ही छोड़ देते हैं

बड़े ही प्यार से माँ बाप पालते जिनको

उमीद उनकी वो  बच्चे  ही  तोड़ देते हैं

दिखाते फिरते नहीं ज़ख़्म अपने दुनिया को

हम  अपना  दर्द  ग़ज़ल  में  निचोड़  देते  हैं

जो आइना तुझे घूरे अधिक समय तक तो

उस आइने की  भी आँखों को फोड़ देते हैं

उठा के …

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Added by नाथ सोनांचली on April 4, 2023 at 1:56pm — 4 Comments

अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास :इस्लाह के लिए

2122   2122   2122  212

तुम हमारे दौर के इक रहनुमा हो तो हँसों।

नाच कठपुतली का जग में हो रहा देखो हँसों।1

इश्क़ वालों ने किसी भी दौर में पाया न चैन,

सूखी आँखों से सभी की दास्तां लिक्खो, हँसों।2

मुझको दिल से है ज़रूरत अपने घर की छांव की,

मेरे पथ में बिछ चुके हर खार को देखो,हँसों।3

घर किसी का तोड़ने फिर आ गई है वो मशीन,

खूब दिल से ये तमाशा देखने वालों हँसों ।4

चूर हो जाओगे तुम टकरा के इन…

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Added by मनोज अहसास on April 1, 2023 at 12:04am — 2 Comments

ताजगी का एक झोंका नित्य लाती खिड़कियाँ - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

रोशनी उस पार बेढब नित दिखाती खिड़कियाँ

काश नन्ही भोली चिड़िया खोल पाती खिड़कियाँ/१

*

है नहीं कोई उबासी सोच पर हावी सनम

ताजगी का एक झोंका नित्य लाती खिड़कियाँ/२

*

दूर पथ पर चाँद बढ़ता हसरतों से देखना

याद का झोंका लिए यूँ याद आती खिड़कियाँ/३

*

इस हवा को बात कोई कर रही बेचैन क्या

द्वार के ही साथ जो ये खटखटाती खिड़कियाँ/४

*

ढूँढ लेना छाँव पन्छी पेड़ की इक डाल पर

दोपहर की धूप से जब कुम्हलाती खिड़कियाँ/५

*

कर दिया जर्जर समय ने ओढ़ ली हर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 31, 2023 at 10:24pm — No Comments

तितली ( दोहे ) - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

आ जाती हैं  तितलियाँ, होते ही नित भोर

सब को इनकी सादगी, खींचे अपनी ओर।१।

*

मधुवन में जब तितलियाँ, बहुत मचाती धूम

पीछे - पीछे  भागता,  हर्षित   बचपन  झूम।२।

*

फूलों से अठखेलियाँ, कलियों से कर बात

तन–मन में जादू  जगा, तितली  सोये रात।३।

*

मधुबन  में  जब  बैठते, बच्चे , वृद्ध, जवान

सबकी देखो तितलियाँ, हरती लुभा थकान।४।

*

छोटे -छोटे  पंख  से, रचकर  मृदु  संगीत

कलियों से तितली कहे, फूल बने हैं मीत।५।

*

नापे नभ  को  तितलियाँ,…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 31, 2023 at 10:02pm — 2 Comments

हमें यूँ न रंगीन सपने दिखाओ - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२/१२२/१२२/१२२

*

अँधेरों से जब जब डरी रोशनी है

बड़ी मुश्किलों में पड़ी जिन्दगी है।१।

*

कहीं आदमी खुद लगे देवता सा

कहीं देवता भी हुआ आदमी है।२।

*

सहेजी न हम से गयी यार पुरवा

कहो मत कि अब हर हवा पश्चिमी है।३।

*

हमें यूँ न रंगीन सपने दिखाओ

हमारे हृदय में बसी सादगी है।४।

*

समझ कौन पाया रही एक औषध

कहन आपकी जो लगी नीम सी है।५।

*

वही लोक में नित हुए देवता हैं

जिन्हें नार केवल रही उर्वसी है।६।

*

मौलिक /…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 30, 2023 at 4:57am — 2 Comments

सम्राट अशोक महान

चन्द्रगुप्त का पौत्र, जो बिन्दुसार का पुत्र था

बौद्ध धर्म का बना अनुयायी

जो धर्म-सहिष्णु सम्राट हुआ||

 

माता जिसकी धर्मा कहलाती, सुशीम नाम का भाई था

इष्ट देव शिव-शंकर पहले

ज्ञान-विज्ञान का बड़ा जिज्ञासु हुआ||

 

परोपकार की भावना जिसमें, उत्सुक जो अभिलाषी था

महेंद्र-संघमित्रा का पिता न्यारा

सदा पुत्र-पुत्री का साथ मिला||

 

बेहतरीन अर्थव्यवस्था ग़ज़ब सुशासन, जिसका…

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Added by PHOOL SINGH on March 28, 2023 at 4:27pm — 1 Comment

अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास

2122    2122     2122     212

ज़िन्दगी बेशक ज़रा छोटी हो पर ऐसी न हो।

जिसमें अपने पास सुनने वाला भी कोई न हो।

तुम ज़रा कह दो उसे पापा सुबह तक आएंगे,

मेरी बेटी आज फिर जिद में अगर सोई न हो।

फासलों का क्या भरोसा वक़्त की सब बात है,

वो शिकायत मत सुना जो दिल से खुद तेरी न हो।

अब यहाँ से लौट कर जाना तो मुमकिन है नहीं,

वो जगह भी देख ले जो आज तक देखी न हो।

आपके होने से इतना तो भरोसा है मुझे,

एक तो शै है जो…

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Added by मनोज अहसास on March 25, 2023 at 7:08pm — 2 Comments

जिस दौर से हम तुम गुजरे हैं

जिस दौर से हम-तुम गुजरे है,

वो दौर ज़माना क्या जाने?

हम दोनों हीं बस किरदार यहाँ के,

कोई अपना अफसाना क्या जाने 

 

रंगमंच के पर्दे के पीछे

चरित्र सभी गढ़े जाते है 

जो कहते है जो करते है

वो बोल सभी लिखे जाते है

 

हम दोनों अपने किरदार में थे

अपनी बेचैनी कोई क्या जाने? 

जिस दौर से हम तुम गुजरे है,

वो दौर जमाना क्या जाने? 

 

है एक लम्हे का साथ सही,

पर साथ पुराना लगता है 

तुम कंधे…

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Added by AMAN SINHA on March 23, 2023 at 10:03am — No Comments

अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास :इस्लाह के लिए

1222×4

एक ताज़ा ग़ज़ल प्रस्तुत है मित्रों इसमें यह सुझाव देने की कृपा करें कि यदि तक की जगह भी कर दिया जाए तो कैसा रहेगा

वफ़ा के रास्ते पे कोई रहबर तक नहीं आता

किसी का ज़िक्र क्या वो अपना होकर तक नहीं आता

मैं अपनी जिंदगी उस रास्ते पर छोड़ आया था

जहाँ से अब कोई रास्ता मेरे घर तक नहीं आता

तुम्हारा दुख वहीं चौखट पे लग के रोता रहता है

सौ जमघट देख कर वो दिल के भीतर तक नहीं…

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Added by मनोज अहसास on March 22, 2023 at 11:00pm — No Comments

केवल तुमको प्यार लिखूँ(गीत-२२) - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

नित्य  तुम्हारे  चन्द्र  रूप  को,  मन  चाहा  शृंगार  लिखूँ ।

मैं जीवन के अन्तिम क्षण तक, केवल तुमको प्यार लिखूँ।।

छुईमुई  हो   पीर  सयानी,

सुख की नूतन रहे कहानी।।

अँखियों में चंचलता खेले,

सिर पर ओढ़े चूनर धानी।।

मुस्कानों  की  हर  गठरी  पर, यौवन  का  उपहार  लिखूँ।

मैं जीवन के अन्तिम क्षण तक, केवल तुमको प्यार लिखूँ।।

*

छमछम  पायल  ओट बजाना

फिर साँसों की सुधि भरमाना।।

भौंरों जैसी अठखेली पर,

छुईमुई सा झट शरमाना।।

बालापन  सी …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 22, 2023 at 9:05am — 2 Comments

ग़ज़ल (गर आपकी ज़ुबान हो तलवार की तरह)

माना  नज़र  है  तेरी  ख़रीदार  की तरह

लेकिन न लूट तू  मुझे  बाज़ार  की तरह

रिश्ते  बिगड़ते  देर  तनिक भी नहीं लगे

गर आपकी ज़ुबान हो तलवार की तरह

वो तो चुनाव  जीत के  परधान  बन  गया

जो  घूमता  था  गाँव  में  बेकार  की तरह

वादा तो कीजिये नहीं और कर दिए अगर

वादा  खिलाफी हो  नहीं सरकार की तरह

देते  हैं  भाव  नेता  चुनावों  के  वक़्त  पर

और  फेंक  देते  बाद में अख़बार की तरह

शाइर …

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Added by नाथ सोनांचली on March 21, 2023 at 7:49pm — 6 Comments

अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास

1222×4

ज़रा सा और मैं दुनिया के ग़म में चूर हो जाता

हमारे बीच का ये फासला भरपूर हो जाता

मैं जैसे रोज जलता हूँ तेरी यादों की बारिश में

किसी दिन तू भी मुझसे मिलने को मजबूर हो जाता

मैं अपने आप से लड़कर भी अक्सर हार जाता हूँ

ज़माने से अगर लड़ता तो चकनाचूर हो जाता

इसी डर ने मुझे तुझ तक पहुँचने से सदा रोका

मेरे साये से तेरा नाम ही बेनूर हो जाता

तेरी बातें बहुत दिन बाद इक हमदर्द से की तो

मुझे…

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Added by मनोज अहसास on March 17, 2023 at 11:16pm — 5 Comments

तुम ना आया करो ख्वाब मे

तुम ना आया करो ख्वाब में हमें रुलाने के लिए

टूट चुके उन नातों को फिर से तोड़ जाने के लिए

तुम जा चुके हो मान लो, इस सत्य को तुम जान लो

उस जहां से ना आया करो हमें सताने के लिए



तुम्हें गए हुए अब दो वर्ष बीत चुके है

बिन तुम्हारे जीना अब हम सीख चुके है

तुम लौटा ना करो सपनों में हमें जगाने के लिए

रात भर जाग कर बस तुम्हें भुलाने ले लिए



मुझे मालूम हैं के हम अंतिम क्षण मिल ना पाए थे

मैं खड़ा था वहीं पर मैंने कदम नहीं बढ़ाए थे

अब आगे बढ़कर तुम… Continue

Added by AMAN SINHA on March 14, 2023 at 10:12am — 1 Comment

पतझड़ से मत घबराना मन (गीत- २१)- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

हर पीड़ा जब पतझड़ ढोता, तब हँसता सन्सार वसंती।

पतझड़ से मत घबराना मन, हर पतझड़ आधार वसन्ती।।

*

सुमन नहीं इसके हिस्से में,

केवल पत्ते, वही बिछाता।

एक यही तो ऋतुराज की,

करने को अगवानी आता।



है इसका हर त्याग अबोला, खिलता जिससे प्यार वसन्ती।

पतझड़ से मत घबराना मन, हर पतझड़ आधार वसन्ती।।

*

मत कोसो इसको नीरस कह,

इस ने हर नीरसता लूटी।

झाड़े इसने तन से कणकण,

तब जाकर नव कोंपल फूटी।।



चलो सराहो इसकी कोशिश, जिस ने जोड़ा तार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 13, 2023 at 8:11pm — 3 Comments

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