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अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास

2122    2122     2122     212

ज़िन्दगी बेशक ज़रा छोटी हो पर ऐसी न हो।
जिसमें अपने पास सुनने वाला भी कोई न हो।

तुम ज़रा कह दो उसे पापा सुबह तक आएंगे,
मेरी बेटी आज फिर जिद में अगर सोई न हो।

फासलों का क्या भरोसा वक़्त की सब बात है,
वो शिकायत मत सुना जो दिल से खुद तेरी न हो।

अब यहाँ से लौट कर जाना तो मुमकिन है नहीं,
वो जगह भी देख ले जो आज तक देखी न हो।

आपके होने से इतना तो भरोसा है मुझे,
एक तो शै है जो निश्चित ही कभी मेरी न हो।

मेरे दिल का कतरा कतरा रो रो कहता है मुझे,
ऐसी कोई रग नहीं जो आपने तोड़ी न हो।

चल ज़माने अब नुमाइश हो चुकी ग़म की बहुत,
बस! हमारे दिल की खातिर मशवरा कोई न हो।

इतना भी आसान कब था भूलना उस ख्वाब को,
बस दुआ इतनी है मेरे घर में अनहोनी न हो।

मैं तो वाकिफ हूँ नहीं अंजाम से मेरे ख़ुदा,
दुर्दशा ऐसी न हो जो पहले से सोची न हो।

कह लिया सब ,सुन लिया सब और क्या बाकी रहा,
तू ख़ुदा उससे भी मिल जिसकी दुआ पूरी न हो।

तेरी रहमत मुझे मिल जाता है सब्र ओ करार,
पर मेरे सर ज़ुल्म की हर इंतहा इतनी न हो।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 2, 2023 at 11:24am

आ. भाई मनोज जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा है। हार्दिक बधाई। 

यह मिसरा बह्र में नहीं है देखिएगा-

तेरी रहमत मुझे मिल जाता है सब्र ओ करार,

कृपया ध्यान दे...

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