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Samar kabeer's Blog – September 2015 Archive (3)

ग़ज़ल :- जान के दावेदार थे सदमे

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़ाइलुन/फ़ेलान



जान के दावेदार थे सदमे

मै अकेला, हज़ार थे सदमे



इस क़दर पाइदार थे सदमे

मेरे हमदम थे,यार थे सदमे



मेरे दिल में मुक़ीम हैं अब तो

कल तलक बे दियार थे सदमे



कोई भी बच नहीं सका इन से

सब के दिल पर सवार थे सदमे



कोई तामीरी काम , नामुम्किन

सारे तख़रीब कार थे सदमे



'मीर'-ओ-'ग़ालिब' के बाद दुनिया में

सिर्फ मेरे ही यार थे सदमे



सोच ने मेरी इनको जन्म दिया

ज़ह्न का ख़लफ़िशार… Continue

Added by Samar kabeer on September 27, 2015 at 2:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल :- मगर वो साज़िशें करता रहेगा

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन

नज़र पे जब तलक पर्दा रहेगा
तुम्हारा अक्स भी धुंदला रहेगा

मैं ज़ख़्मों की तिजारत कर रहा हूँ
बताओ फ़ायदा कितना रहेगा

वो सरगोशी में बातें कर रहा है
जो देखेगा उसे ख़दशा रहेगा

मिलेंगे हम मगर ये शर्त होगी
हमारे दरमियाँ पर्दा रहेगा

वहाँ मेरी ख़मोशी काम देगी
वो अपनी आग में जलता रहेगा

"समर" ,मालूम है अंजाम उसको
मगर वो साज़िशें करता रहेगा

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by Samar kabeer on September 21, 2015 at 11:15pm — 21 Comments

ग़ज़ल :- थक गया मैं

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ा



समझा समझा कर हरजाई थक गया मैं

दुनिया फिर भी समझ न पाई थक गया मैं



मेरे घर में पाँव न रक्खा ख़ुशियों ने

बजा बजा कर ये शहनाई थक गया मैं



पूरा करते करते सात सवालों को

कहता है अब हातिम ताई थक गया मैं



जाहिल आक़िल को तस्लीम नहीं करते

करते करते उनसे लड़ाई थक गया मैं



मेरी बुराई करते करते आज तलक

थक न पाई सारी ख़ुदाई थक गया मैं



मैंने सबसे मिलना जुलना छोड़ दिया

दरवाज़े पर लिख दो भाई थक… Continue

Added by Samar kabeer on September 4, 2015 at 10:00pm — 23 Comments

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