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क़दम उठाने से पहले विचार करना था

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन

(आख़री शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ करें और शैर का लुत्फ़ लें)

अगर वफ़ा का चलन इख़्तियार करना था
क़दम उठाने से पहले विचार करना था

ये एक बार नहीं बार बार करना था
बग़ैर नाव के दरिया को पार करना था

हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर भटकते फिरते हैं
ग़ज़ल का फ़न जो हमें बा वक़ार करना था

उठाके बोझ ज़माने का तेरी चाहत में
शऊर-ओ-फ़िक्र की सरहद को पार करना था

वो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आता
उसी के तीर से उसका शिकार करना था

__________

हुसूल-ए-इल्म :- ज्ञान प्राप्त करना
शऊर :- अक़्ल
तेग़ :- तलवार

--समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on May 15, 2017 at 5:48pm
जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Mahendra Kumar on May 15, 2017 at 10:45am

हमसे पूछो कि ग़ज़ल मांगती है कितना लहू

सब समझते है ये धन्‍धा बड़े आराम का है

-राहत इन्दौरी 

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है,ग़ज़ल का फ़न क्या
चन्द लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाये

-जाँ निसार अख़्तर

लोग आसान समझते हैं ग़ज़ल गोई को
दिल का शीराज़ा बिखरता है ग़ज़ल कहने में

-नरेश कुमार शाद

हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर भटकते फिरते हैं
ग़ज़ल का फ़न जो हमें बा वक़ार करना था

-समर कबीर 

वाह! यह सिर्फ ओबीओ पर ही संभव है. जय-जय. 

Comment by Mahendra Kumar on May 15, 2017 at 10:28am

//ये एक बार नहीं बार बार करना था, बग़ैर नाव के दरिया को पार करना था// वाह! क्या ख़ूब शेर कहा है आपने आदरणीय समर कबीर सर. इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई प्रेषित है. सादर. 

Comment by Samar kabeer on May 12, 2017 at 5:53pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by KALPANA BHATT on May 11, 2017 at 10:50pm
हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर भटकते फिरते हैं
ग़ज़ल का फ़न जो हमें बा वक़ार करना था

उठाके बोझ ज़माने का तेरी चाहत में
शऊर-ओ-फ़िक्र की सरहद को पार करना था

बहुत खूबजनाब समर साहब
Comment by Samar kabeer on May 8, 2017 at 3:18pm
जनाब रवि प्रभाकर साहिब आदाब,आप ने मेरी ग़ज़ल में शिर्कत की ये मेरे लिये किसी इनआम से कम नहीं,और आपने मेरी जो तारीफ़ लिखी है वो यक़ीनन आपकी मेरे प्रति मुहब्बत का सुबूत है,'जाँ निसार अख़्तर'ने कहा था-
'हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है,ग़ज़ल का फ़न क्या
चन्द लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाये'
'नरेश कुमार'शाद''ने कहा-
'लोग आसान समझते हैं ग़ज़ल गोई को
दिल का शीराज़ा बिखरता है ग़ज़ल कहने में'
मैं भी अपने बुज़ुर्गों की इसी रिवायत को आगे की नस्लों तक पहुंचाने का काम कर रहा हूँ,मेरी नज़र में साहित्य साधना भी एक इबादत का दर्जा रखती है ।
ग़ज़ल आपको पसंद आई लिखना सार्थक हुआ,ग़ज़ल में शिर्कत और दाद-ओ-तहसीन के लिये तहे दिल से आपका शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on May 8, 2017 at 3:03pm
जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on May 8, 2017 at 3:01pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Ravi Prabhakar on May 6, 2017 at 4:28pm

आदरणीय समर साहिब, आदाब । आपकी ग़ज़ल पढ़कर पता चलता है कि ग़ज़ल क्‍या होती है। तकनीकी तौर पर तो कुछ कह ही नहीं सकता पर भाव के स्‍तर पर एक-एक शे'र के पीछे एक पूरी की पूरी कहानी महसूस कर पा रहा हूं। राहत इंदौरी सॉहिब का एक शे'र याद आ गया-

हमसे पूछो कि ग़ज़ल मांगती है कितना लहू

सब समझते है ये धन्‍धा बड़े आराम का है ।

कितनी प्रौढ़ता झलकती है अापकी ग़ज़ल में । अक्‍सर  आपकी ग़ज़लें पढकर ऐसा लगता है कि जैसे महात्‍मा बुद्ध एक बहुत खुले मैदान में बरगद के नीचे बैठे अपने शिष्‍यों को शिक्षा दे रहे हों । आपकी ग़ज़लों में आपका विशाल अनुभव झलकता है। मन अंदर तक त़ृप्‍त हो जाता हूं आपकी ग़ज़ल पढ़कर । भगवान आपकी कलम को बल प्रदान करें । सादर शुभकामनाएं

Comment by रामबली गुप्ता on May 3, 2017 at 7:36pm
वाह वाह आद0 समर भाई साहब सभी शैर अच्छे हुए हैं। दिली दाद के साथ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं।सादर

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