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एक मुश्किल बह्र,"बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम" में एक ग़ज़ल

अरकान:-12112 12112

न छाँव कहीं,न कोई शजर

बहुत है कठिन,वफ़ा की डगर

अजीब रहा, नसीब मेरा

रुका न कभी,ग़मों का सफ़र

तलाश किया, जहाँ में बहुत

कहीं न मिला, वफ़ा का गुहर

तमाम हुआ, फ़सान: मेरा

अँधेरा छटा, हुई जो सहर

ग़मों के सभी, असीर यहाँ

किसी को नहीं, किसी की ख़बर

बहुत ये हमें, मलाल रहा

न सीख सके, ग़ज़ल का हुनर

हबीब अगर, क़रीब न हो

अज़ाब लगे, हयात "समर"

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on Saturday

आ0 कबीर सर सादर नमन ।  इतनी मुश्किल बह्र पर ग़ज़ल कहना बड़ी बात है । हर शेर लाजवाब लिखा गया है । तहेदिल से आपको बहुत बहुत बधाई सर ।

Comment by Shaikh Zubair on July 12, 2019 at 11:49pm
वाह, बहुत ख़ूब, मोहतरम समर कबीर सर पढ़ कर दिल ख़श हो गया
Comment by Samar kabeer on July 11, 2019 at 11:13pm

जनाब अजय तिवारी साहिब आदाब,आप ग़ज़ल तक आए, ग़ज़ल को पसंद किया मेरा लिखना सार्थक हो गया ।

आपने सहीह फ़रमाया इस अरबी अड़ियल घोड़े को क़ाबू करने में बहुत लुत्फ़ हासिल हुआ,औऱ फ़ितरतन में मुश्किल पसंद वाक़ै हुआ हूँ,पुनः धन्यवाद ।

Comment by Samar kabeer on July 11, 2019 at 11:04pm

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ख़ुश रहो, सलामत रहो ।

Comment by Samar kabeer on July 11, 2019 at 11:03pm

जनाब गिरिराज भण्डारी जी आदाब,बहुत समय बाद अपनी ग़ज़ल पर आपकी टिप्पणी पढ़कर बहुत प्रसन्नता हुई,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on July 11, 2019 at 11:01pm

जनाब दण्डपाणि 'नाहक़" जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on July 11, 2019 at 10:58pm

जनाब दयाराम मेठानी जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on July 11, 2019 at 10:57pm

जनाब  लक्ष्मण धामी जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on July 11, 2019 at 10:54pm

जनाब प्रदीप जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by vijay nikore on July 10, 2019 at 4:33pm

लाजवाब गज़ल मानो दिल में समा गई। बहुत ही अच्छी लगी। दिल से बधाई, भाई समर जी।

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